卐 सत्यराम सा 卐
*दादू एक सुरति सौं सब रहैं, पंचों उनमनि लाग ।*
*यहु अनुभव उपदेश यहु, यहु परम योग वैराग ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi
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*विरक्त का अंग १५*.
नारी नैन न देखिये, श्रवण हुं सुनिये नाँहिं ।
बैयर वचन न बोलिये, रज्जब रस भंग माँहिं ॥२९॥
कामुक दृष्टि से नारी को मत देखो । कामुक भावना रख कर नारी का चरित्र तथा वचन न सुनो, कामुक भावना से नारी शब्द मत बोलो वा कामुक भावना से नारी से मत बोलो कारण, कामुक भावना से देखने, सुनने और बोलने से हृदय का भजन-रस नष्ट हो जाता है अत: माता, बहिन, पुत्री और आत्म दृष्टि से ही देखो, सुनो और बोलो ।
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माता मेरी सकल ही, जो जन्म जग आय ।
जन रज्जब जननी सबै, कासौं विषय कमाय ॥३०॥
जगत में जो भी नारी जन्मी है, वह मेरी माता है, जब सब ही माता है तब किसके विषय सुख प्राप्त किया जाय ?
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जा माता में हम भये, सो माता सब ठौर ।
रज्जब विरच्या यू समझ, नहीं भजन कोई और ॥३१॥
जिस माता से हम जन्मे हैं, वह माता सब स्थानों में है, यही समझ हम विरक्त हुये हैं । हमारे मन में माता रूप भावना से भिन्न अन्य का कोई भी चिन्तन नहीं होता ।
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सब ही माता सब बहिन, सब पुत्री कर जान ।
रज्जब के रमणी नहीं, समझा सद्गुरु ज्ञान ॥३२॥
जो अपने से अवस्था में बड़ी हो उन सब को माता, समान अवस्था की हो उन सब को बहन और छोटी हो उन सब को पुत्री समझना चाहिये । सद्गुरु के ज्ञान से यही हमने समझा है, अत: हमारी दृष्टि से भोगने योग्य नारी कोई भी नहीं है ।
(क्रमशः)

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