#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
.
*साधु का अँग १५*
.
जहं तिरिये तहं डूबिये, मन में मैला होइ ।
जहं छूटे तहं बँधिये, कपट न सीझे कोइ ॥१२३॥
जिस मनुष्य शरीर में आकर भवसागर को पार किया जाता है, उस मनुष्य शरीर को पाकर भी यदि मन में अविद्या - मल रहेगा तो डूबेगा ही । जिन सन्तों के सत्संग में मुक्ति प्राप्त होती है, उसमें जाकर भी यदि मन में विषय - चिन्तन ही रहा तो उल्टा बन्धन में ही पड़ेगा । क्योंकि, कपट से कोई भी ब्रह्म प्राप्ति रूप सिद्धावस्था को प्राप्त नहीं होता ।
.
*सत्संग महिमा*
दादू जब लग जीविये, सुमिरण संगति साध ।
दादू साधू राम बिन, दूजा सब अपराध ॥१२४॥
इति साध का अँग समाप्त: ॥१५॥सा - १२४॥
सन्त - महिमा पूर्वक सत्संग करने की प्रेरणा कर रहे हैं - सँसार में जब तक जीवित रहें तब तक राम - नाम का स्मरण और सन्तों की संगति करते ही रहना चाहिए । क्योंकि राम - भजन और सन्त - संगति से अन्य जो भी कार्य हैं, वे पाप मिश्रित होने से पाप रूप हैं ।
इति श्री दादू गिरार्थ प्रकाशिका साधु का अँग समाप्त ॥१५॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें