रविवार, 17 दिसंबर 2017

= १० =


卐 सत्यराम सा 卐
*बाजी चिहर रचाय कर, रह्या अपरछन होइ ।*
*माया पट पड़दा दिया, तातैं लखै न कोइ ॥* 
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com 

'जो सच्चा नहीँ है, उसका जन्म कहां से होता है? जिसका जन्म नहीं हुआ, उसका नाश कहां होता? इस प्रकार जो असत् है, वस्तु रुप है ही नहीँ, उसका प्रारब्ध कर्म कहां से हो !' जो असत् है, जो है ही नहीँ, मेरा, इसका जन्म कहां से होता है? कब होता है? इसका अंत कैसे होगा? कठिन है, क्योँकि मनुष्य को लगेगा कि जब मेरा है, तो इस मेरा है का जन्म तो होता ही होगा, अन्यथा ये होता कैसे? और यदि मेरा कुछ है, तो कहीँ तो इसका अंत होता होगा, अन्यथा इससे छुटकारा कैसे होगा?
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इसे समझने के लिये भारतीय मनीषा ने जो मिथ्या की कोटि कही है, उसे ध्यान मे लेना होगा।
रस्सी मे सांप दिखाई पड़ गया। पास जाकर देखा, सांप नहीं है, रस्सी है। सांप का जन्म रस्सी में कैसे हुआ? दिखाई पड़ा था। जन्म कैसे कहां हुआ? झूठ का जन्म कैसे होगा? उजाले में पास जाकर देखा तो सांप नहीँ है, तो मृत्यु भी हो गई।
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लेकिन लाश कहां है सांप की? जो दिखाई पड़ता है, और था नहीँ, उसका जन्म नहीँ होता, उसकी मृत्यु भी नहीँ होती, वह भ्रांति-मात्र है। भ्रांति हो सकती है। भ्रांति आरोपित है। रस्सी मे किसी सांप का कोई जन्म हुआ ही नहीं था, मनुष्य के मन ने प्रक्षेपण किया था और रस्सी मे सांप दिखाई दिया था। सिनेमागृह में पीठ की तरफ लौट कर मनुष्य नहीँ देखता। देखेगा भी क्या, वहां कुछ होता भी नहीँ देखने को ! सामने पर्दे पर सब होता है; रंग का, रुप का, गीत का, संगीत का प्रवाह होता है पर्दे पर सामने।
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लेकिन पर्दे पर कुछ नहीँ होता, पर्दा होता है खाली; केवल छाया और प्रकाश कि किरणोँ का जाल होता है। सब कुछ होता है पीछे, पीठ के पीछे-जहां प्रोजेक्टर होता है। जिसे कल्पित कहा है, प्रक्षेपित कहा है, अंग्रेजी शब्द है उसके लिये-प्रोजेक्शन, उसी से बना है प्रोजेक्टर।
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वहां से सब फेंका जा रहा है पर्दे पर, और पर्दे पर, जहां है नहीँ, वहां दिखाई पड़ रही है। जहां दिखाई देती है, वहां है नहीँ, और जहां है, वहां पीठ किये बैठा है मनुष्य,वहां देखता नहीँ। रस्सी पर्दे का काम कर रही थी और मनुष्य का मन प्रक्षेपित कर रहा था सांप को रस्सी पर और रस्सी सांप प्रतीत हो रही थी। मन अपनी धारणाएं लिये बैठा है भीतर, जरा सा इशारा, और मन धारणाओँ का फैलाव शुरु कर देता है, पर्दा मिला कि प्रोजेक्टर का कार्य शुरु। जागते में संपूर्ण मनुष्य-जाति ये ही कर रही है। इस तथाकथित जागरण से भी जब कोई जागता है तब वो जान लेता है -
जो था नहीँ, उसे देखा !
उसे पकड़ा !
उसे छोड़ा।

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