#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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कुसंगति केते गये, तिनका नाँव न ठाँव ।
दादू ते क्यों उद्धरैं, साधु नहीं जिस गाँव ॥१०९॥
कुसंगति के द्वारा कितने ही प्राणी नष्ट हो गये हैं, उनका सँसार में न नाम रहा है और न स्थान ही रहा है । जिस ग्राम में सँत नहीं रहते, उस ग्राम के लोगों का उद्धार कैसे हो सकता है ?
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भाव भक्ति का भँग कर, बटपारे१ मारहिं बाट२ ।
दादू द्वारा मुक्ति का, खोले जड़ैं कपाट ॥११०॥
जो लोग भाव - भक्ति के द्वारा मुक्ति - धाम - द्वार के कपाट खोलते हैं और उसमें प्रवेश करने के लिए आगे बढ़ते हैं, तब दूर्जन और दूर्गण रूप लुटेरे१ मार्ग२ में ही विषयों में प्रवृत्त करना रूप मारपीट द्वारा उनके भाव - भक्ति को छीन कर, मुक्ति - धाम - द्वार के कपाट बन्द कर देते हैं ।
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*सत्संग महिमा*
साधु संगति अंतर पड़े, तो भागेगा किस ठौर ।
प्रेम भक्ति भावे नहीं, यहु मन का मत और ॥१११॥
१११ - ११२ में किसी साधक को सत्संग का माहात्म्य कह रहे हैं - हे साधक ! यदि सँत - संगति से तू उपराम(अन्तराम) करने लगेगा, तो इस साँसारिक कष्ट निवारण के लिए सँत - संगति से भाग कर किस स्थान में जायगा ? सत्संगति के अतिरिक्त कोई उपाय नहीं है । यदि तुझे भगवान् की प्रेमाभक्ति अच्छी नहीं लगती तो तेरे मन का यह सिद्धान्त परमार्थ - पथ से भिन्न ही है ।
(क्रमशः)

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