मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

विरक्त का अंग १५(३३-३६)

#daduji


卐 सत्यराम सा 卐
*ये अरदास दास की सुनिये, दूर करो भ्रम मेरा ।*
*दादू तुम बिन और न जानै, राखो चरणों नेरा ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी** 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Mahant Ramgopal Das Tapasvi 
*विरक्त का अंग १५*
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रज्जब निकसे पूत ह्वै, पैठे पुरुष न होय । 
नाता माता का रह्या, सो जन विरला कोय ॥३३॥ 
जो पुत्र होकर निकला ओर पुन: पुरुष होकर प्रवेश नहीं किया उसी का माता का संबन्ध रह है ऐसा पुरुष कोई विरला ही होता है । 
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नारी नींद न विलसिये, सुन्दरि स्वप्ने त्याग । 
जन रज्जब जग वह यती, वन्दनीय१ वैराग ॥३४॥ 
विरक्त को नारी संग सोते समय स्वप्न में ही नहीं करना चाहिये, जो स्वप्न में भी नारी से बचा रहता है, वह सच्चा यती है और उसी का वैराग्य माननीय१ है । 
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मनसा नारी त्याग कर, मन वैरागी होय । 
रज्जब राखे जतन यहु, जती कहावे सोय ॥३५॥ 
जिसका मन भोगाशा रूप नारी को त्याग कर विरक्त हो जाय और पुन: भोगाशा मन में नहीं आ जाये इसका यत्न रक्खे, ऐसा साधक ही यती कहलाता है । 
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रज्जब दारा देह को, परसे पुरुष न प्राण । 
बालक व्यसन न उपजे, सो वैरागी जाण ॥३६॥ 
जो प्राणधारी पुरुष देह रूप नारी का स्पर्श न करे अर्थात देहाध्यास त्याग दे और जिसके मादक पदार्थ सेवन वा कामादि कोई भी प्रकार का व्यसन रूप बालक नहीं उत्पन्न हो, उसी को विरक्त जानना चाहिये ।
(क्रमशः)

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