रविवार, 17 दिसंबर 2017

= अजब ख्याल अष्टक(ग्रन्थ २५-८गी/१०दो) =

🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= अजब ख्याल अष्टक(ग्रन्थ २५) =*
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*= छन्द =*
*वेच्यूंन उसकौं कहत बुजरग१,*
*वेनि मून२ उसै कहैं ।*
*अरु औलिया अँबिया३ वै भी,*
*गोस कुतब खड़े रहैं ॥*
*को कहि सकै न कह्या न किनहूँ,*
*सखुन परै निराल४ है ।*
*यौं कहत सुन्दर कब्ज दुन्दर,*
*अजब ऐसा ख्याल है ॥८॥*
(१. बुजरग(फा०) = बुजुर्ग, वृद्ध ।) (२. बेनिमून(फा०) = बेनिमूना, बेमिसाल, अनुपम ।) (३. अम्बिया=(अ० नबी, शब्द का बहुवचन) पैगम्बर लोग ।) (४. निराल=निराला, न्यारा ।)
वृद्ध ज्ञानी पुरुष उस परम तत्व को निरुपम(अद्वितीय) कहते हैं । पहुँचे हुए सन्त व् पैगम्बर भी उसका वर्णन करने में मूर्तिवत्(निश्चल) खड़े रह जाते हैं । न कोई आज तक उसका वर्णन कर पाया, न कोई आगे कर सकेगा; क्योंकि वह तत्व तो निराला(अनिवर्चनीय) है ॥८॥
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*= दोहा =*
*ख्याल अजब उस एक का, सुन्दर कह्या न जाइ ।*
*सखुन तहां पहुचै नहीं, थक्या उरै ही आइ ॥१०॥*
॥ समाप्तोSयं अजब ख्याल अष्टक ग्रन्थः ॥
ऐसे उस परम तत्व का चिन्तन शब्दों में नहीं कहा जा सकता । विद्वान् लोग भी उस तत्व का वर्णन करने में अपने को पूर्ण असमर्थ पाते हैं । वह तत्व तो पुर्णतः अनुभवैकगम्य है । और वह अनुभव विना मन और इन्द्रियों के निग्रह(संयम द्वारा उसका निरन्तर ध्यान(चिन्तन) किये बिना हो नहीं सकता ॥१०॥
॥ अजब ख्याल अष्टक समाप्त ॥
(क्रमशः)

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