#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू सूखा सहजैं कीजिये, नीला भानै नांहि ।*
*काहे को दुख दीजिये, साहिब है सब मांहि ॥*
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साभार ~ स्वामी सौमित्राचार्य
“प्रपत्ति” ‘नमामि भक्तमाल को’
भगवद्भक्तों के भक्त श्री नारायणदास जी
श्री नारायणदास जी में प्रत्येक जीव के प्रति करुणा थी चाहे वो मनुष्य हों या वृक्ष. एक बार एक राजा इनके आश्रम के पास हरे वृक्षों को कटवा रहा था. इन्होंने पेड़ काटने से मना किया पर राजकर्मचारी नहीं माने. ये स्वयं पेड़ के सामने खड़े हो गए और बोले कि उनके रहते पेड़ नहीं कट सकते, पेड़ों को काटना जीवहत्या के समान है.
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कर्मचारियों को क्रोध आ गया और उनमें से एक ने इन्हीं के ऊपर प्रहार कर दिया. पर जिसने प्रहार किया था वही चिल्लाकर पृथ्वी पर गिर पड़ा और छटपटाने लगा. इस समाचार को सुनकर राजा वहाँ आया और उसने संत से क्षमा मांगी. साथ ही इनके उपदेशों के अनुसार ही चलने का संकल्प लिया.
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संतों में प्रत्येक जीव के प्रति दया और करुणा होती है चाहे वो पशु हों, पौधे हों या मनुष्य. यहाँ संत केवल वृक्षों की ही रक्षा नहीं कर रहे थे बल्कि उन कर्मचारियों की भी जीवहत्या के पाप से रक्षा कर रहे थे. मगर मूर्ख मनुष्य संतों की करुणा को समझ नहीं पाते हैं और उनकी करुणा को उनका विरोध मान बैठते हैं. इसका मुख्य कारण है ‘अहंकार’. अहंकार का पर्दा स्वयं अपने हितैषी को देखने नहीं देता है.
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दूसरी ओर संतों में तो अहंभाव होता ही नहीं है. वह अपने को सब में और सबको अपने में देखते हैं. इसी कारण जब संत पर प्रहार किया गया तो उसका असर करने वाले पर ही हुआ.

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