卐 सत्यराम सा 卐
*दादू एता अविगत आप थैं, साधों का अधिकार ।*
*चौरासी लख जीव का, तन मन फेरि सँवार ॥*
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साभार ~ Nitin Rampremi
तुलसी लीलामृत भाग ४७
(रामप्रेममूर्ति श्रीमद् गोस्वामी तुलसीदासजी की मुंख्यतः श्रीमद बेनीमाधवदासजी विरचीत मूल गोसाईचरित पर आधारित अमृतमयी लीलाएँ)
एक दिन एक ब्राह्मणका बालक मर गया । वह गोस्वामीजी के प्रभाव से परिचित था अतः रोता बिलखता हुआ बालकके शवको लेकर आया और गोस्वामीजी के चरणों में पडकर बालक को जीवित करने के लिए बहुत रोया गिडगिडाया । यद्यपि गोस्वामीजी ने बहुत समझाया 'नस्वर रुप जगत सब देखहु हृदय बिचारि ।' परंतु उसे एक भी उपदेश नहीं लगा । तभी तो कहा गया है 'रहत न आरत के चित चेतू ।' वह तो शव को कुटि के द्वार पर छोडकर घर चला गया । गोस्वामीजी बडे असमंजस में पड गये । अंतमें इन्होंने श्रीहनुमानजी का स्मरण किया । श्रीहनुमानजी ने यमपुरी जाकर यमराज से बालकके प्राण लौटाने का अनुरोध किया । यमराज ने तर्क प्रस्तुत किया-
लिखिता चित्रगुप्तेन ललाटाक्षर मालिका ।
सा न चालयितुं शक्या सुरैस्त्रिदशैरपि ॥
अर्थात भाग्य बदलनेका सामर्थ्य किसी में भी नहीं है । श्रीहनुमानजीने कहा-
यद्धात्रा लिखितं भाले तन्मृषा नैव जायते ।
ऋते श्रीरामदासानां प्रेमनिर्भरचेतसाम ॥
- विधाता ने भालपर लिखा हुआ(भाग्य) कभी झूठा नही होता पर ये(नियम) रामप्रेमनिर्भर चेतनावाले श्रीरामदासों को छोडकर कहा गया है ।
अतः आप मेरे कहने से बालक को पुनः जीवित कर दें । परंतु यमराज ने इस बात पर ध्यान नहीं दिया, तब हनुमानजी ने क्रोध में भरकर यम सहित यमपुरी को अपनी पूँछ मे लपेट लिया और बोले कि बालक को प्राणदान दो अन्यथा मै अभी तुम्हारा सर्वनाश करता हूँ । यम ने डरकर तुरंत बालक को जीवित कर दिया । श्रीगोस्वामीजी ने कहा- 'जय हनुमान !' और अयोध्यावासी बोले 'जय तुलसी !'
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अयोध्या में प्रसिद्ध संत श्रीदेवमुरारीजी और उनके शिष्य मलूकदासजी गोस्वामीजी का दर्शन करने आये । दोनों महापुरुष गोस्वामीजी का दर्शन और सत्संग कर बडे ही आनंदित हुए । इस प्रकार कुछ दिन श्रीअवध रहकर गोस्वामीजी मलूकदासजी के साथ काशी चले आये । काशी में गोस्वामीजी ने क्षेत्र-संन्यास ले लिया । शरीर वृद्ध हो गया था, फिर भी वे माघ के महिनें में सूर्योदय से पूर्व गंगा में खडे होकर रामनाम का जप किया करते थे । रोएँ खडे होते, शरीर काँपता होता, परंतु उन्हें इसकी तनिक भी परवाह नहीं थी । एक दिन इसी प्रकार जप कर रहे थे । कुछ अधिक ही ठण्ड होने के कारण दाँत बज रहे थे । यह सब देखकर तट पर खडी एक वेश्या गोस्वामीजीपर तरस खा रही थी और अपने भाग्य को सराह रही थी कि मैं कितनी सुखी हूँ । तब तक गोस्वामीजी जाप पुरा करके बाहर निकलने लगे, उस समय उनकी धोतीका दो बूँद छींटा उस वेश्यापर जा पडा और उस वेश्या की मनोदशा ही बदल गयी । वह बहुत देर तक उन्हें एकटक देखती रही । उसके मन में बडा निर्वेद हुआ । उसकी आँखों के सामने पाप के परिणाम स्वरुप नरक में जो यातना सहनी पडती है वह सब दृश्य उपस्थित हो गये । वेश्या काँप गयी । उसे अपने पाप याद आने लगे । उसे बडी ग्लानि हुई । अत्यंत दीन होकर त्राही त्राही करती हुई गोस्वामीजी के चरणों पर गिर पडी । कोमल चित संत तुलसीदासजी ने उसे धैर्य बँधाया -
'तुलसी अजहूँ सुमिरु रघुनाथहिं तऱ्यौ गयन्द जाके एक नाम ।'
**और**
'जनि डरपहिं तोसे अनेक खल अपनाये जानकीनाथ ।'
इस प्रकार गोस्वामीजी से उपदेश पाकर वह वेश्या समस्त पाप प्रपंच से दूर हटकर श्रीरघुपति का गुणगान करने लगी ।
(क्रमशः)

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