मंगलवार, 5 दिसंबर 2017

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卐 सत्यराम सा 卐
*वैरी मारे मरि गये, चित तैं विसरे नांहि ।*
*दादू अजहूँ साल है, समझ देख मन मांहि ॥* 
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साभार ~ oshoganga
क्व धनानि क्व मित्राणि क्व मे विषयदस्यवः।
क्व शास्त्रं क्व च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा॥ 
(अष्टावक्र: महागीता) 
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'जब मेरी स्पृहा नष्ट हो गयी तब मेरे लिए कहां धन, कहाँ मित्र, कहां विषय रूपी चोर हैं? कहां शास्त्र, कहां ज्ञान है?'
बहुत गहरी बात हैं ये, थोड़ा ध्यान से पढ़ना, धन छोड़ना सरल है; परंतु धन छोड़ने से धन नहीं छूटता है। इधर धन छूटा तो कुछ और धन बना लेते हैं हम, जैसे पुण्य को धन बना लेंगे की पूण्य अर्जित कर लिया धन छोड़ के और फिर वही हमारी संपदा हो जाएगी। स्पृहा छूटने से धन छूटता है। फिर पुण्य भी धन नहीं। स्पृहा छूटने से, वासना छूटने से सब छूट जाता है न कोई मित्र रह जाता है न कोई शत्रु।
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हम मित्र किसे मानते हैं? उसी को न जो हमारी वासना में सहयोगी हो। और जो वासना में सहयोगी न बने, तो वो शत्रु। इसलिए तो कहावत है कि जो समय पर काम आए वह मित्र। समय पर काम आने का क्या अर्थ? जब हमारी वासना की दौड़ में कहीं अड़चन आती हो तो वह सहारा दे, कंधा दे। समय पर काम आए तो मित्र। काम ही क्या है? कामना ही तो काम है।
जनक कहते हैं. 'जब मेरी स्पृहा नष्ट हो गयी।’
क्व धनानि क्वप मित्राणि क्वट मे विषयदस्यव
क्व शास्त्रं क्वा च विज्ञानं यदा मे गलिता स्पृहा॥
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यदा मे स्पृहा गलित।
जब मेरी गल गयी वासना, स्पृहा की दौड़, पाने की आकांक्षा; कुछ हो जाऊं, कुछ बन जाऊं, कुछ मिल जाए, ऐसा जब कुछ भी भाव न रहा; जो हूं, उसमें आनंदित हो गया; जैसा हूं उसमें आनंदित हो गया, तथ्य ही जब मेरे लिए एकमात्र सत्य हो गया; कुछ और होने की वासना न रही, तब तदा मे क्वे धनानि फिर धन क्या? हो तो ठीक; न हो तो ठीक, है तो खेल; न हो, तो खेल। क्वक मित्राणि फिर मित्र कैसे? कोई पास हुआ तो ठीक; नहीं हुआ पास तो ठीक। निर्धन होकर भी स्पृहा से शून्य व्यक्ति बड़ा धनी होता है। बिना मित्रों के होकर भी सारा जगत उसका मित्र होता है। जिसकी स्पृहा नहीं रही उसका सभी कोई मित्र है वृक्ष मित्र हैं, पशु-पक्षी मित्र हैं। स्पृहा से शत्रुता पैदा होती है। उसका परमात्मा मित्र है जिसकी स्पृहा न रही।
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जनक कहते हैं. 'यहां तो कोई स्पृहा न रही, अब क्या धन, क्या मित्र? और विषय रूपी चोरों का अब क्या डर?' यहां कुछ है ही नहीं जिसको हम चुरा ले जायेंगे। यहां तो जो चुराया जा सकता है, हमने जान ही लिया कि व्यर्थ है।

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