#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू साहिब कसै सेवक खरा, सेवक को सुख होइ ।*
*साहिब करै सो सब भला, बुरा न कहिये कोइ ॥*
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साभार ~ स्वामी सौमित्राचार्य
“प्रपत्ति”
‘नमामि भक्तमाल को’
श्री हरिदास जी
श्री हरिदास जी एक राजा थे और इनकी संतों के चरणों में अद्भुत प्रीति थी. इनके महल में साधू-संत बिना रोकटोक आया-जाया करते थे. ये संतों से कुछ नहीं छुपाते थे और पूरी निष्ठा से उनकी सेवा करते थे. एक बार प्रभु ने एक लीला करी. प्रभु एक बाल संत बनकर इनके यहाँ आ गए और इनके महल में रहने लगे. राजा इनके प्रति भगवन्मय वात्सल्य भाव रखते थे. प्रभु भी वहाँ बालक-बालिकाओं के साथ खेला करते थे.
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गर्मी के दिन थे. प्रभु ने लीला रची. प्रभु इनकी पुत्री के साथ खेलते-खेलते छत के ऊपर ही सो गए. राजा दातुन करते हुए छत पर आये और संत को सोते हुए देखा. इन्होंने अपनी चादर उनको ओढा दी. सुबह जब बालक भगवान और राजा की कन्या उठे तो चादर को देखकर आश्चर्यचकित हुए. साथ ही देर से उठने के लिये घबड़ा भी गए. कन्या ने पहचान लिया कि चादर पिता जी की है. भगवान ने जानबूझ कर ऐसी मुखाकृति बनाई जैसे कोई भूल हो गयी हो और दृष्टि नीचे किए हुए छत से उतर कर स्नान करने चले गए.
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संत को ऐसा करते हुए देखकर हरिदास जी बहुत परेशान हुए और एकांत में ले जाकर उनके चरण पकड़ लिये. राजा ने कहा, ‘प्रभु आप कैसी भी लीला कीजिये मगर ऐसी लीला मत कीजिये जिससे नास्तिक दुष्ट लोग संतों की निंदा करें. मुझे अपनी निंदा का भय नहीं है, वह तो मुझे सुख ही देती है पर संत-निंदा मुझे नहीं सुहाती है.’ भगवान ने फिर लीला करी कि जैसे वह लज्जित हो रहे हों और महल से जाने को कहने लगे. श्री हरिदास जी ने इनके चरण पकड़ लिये और बहुत विनय करी जिससे भगवान प्रसन्न हो गए और अपने वास्तविक स्वरूप में राजा को दर्शन दिए. भगवान वरदान स्वरूप बाल-संत रूप से इनके घर में ही रह गए.
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प्रेम में दो बातें होती हैं. पहली बात यह कि जिससे हम प्रेम करते हैं उसमें दोष-दर्शन नहीं करते हैं और दूसरा उसकी निंदा नहीं सुन सकते हैं. राजा में यह दोनों बातें ही थीं. यही उनके प्रेम की सच्ची पहचान थी. अब अगर हम अपनी भक्ति को दृढ़ करना चाहते हों तो यह दोनों बातें अपने में लाने की कोशिश करें. प्रतिकूलता आने पर / अपने मन की बात न होने पर कभी भगवान से शिकायत नहीं रखें कि हमने इतनी आराधना करी पर क्या फायदा हुआ. ऐसा करना तो प्रभु में गलती निकालना हुआ और यह तो प्रीति में कलंक है. प्रेम तभी कमजोर होने लगता है जब हम जिससे प्रेम करते हैं उसमें कमियाँ निकालना शुरू करते हैं. हम न ही कभी कमियों को देखें और न ही सुनें.
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तीसरी बात है कि अपनी निंदा अच्छी ही लगनी चाहिए. इस पर थोड़ा सूक्ष्मता से विचार करें. कभी-कभी हम कोई साधना शुरू करते हैं पर अगर अनुकूल परिणाम नहीं आता तो उस साधना पद्धति या इष्ट पर ही शंका करने लगते हैं. ऐसा इसलिए होता है क्योंकि हमें अपनी गलती स्वीकार करने की आदत नहीं है उल्टा दूसरों पर दोष मढ़ने की आदत है. पर यदि हमें अपने इष्ट और साधन पर पूरा भरोसा है(कि वो कभी गलत नहीं हो सकते) तो अपनी गलती ढूंढ कर और उसे समझ कर हम अध्यात्मिक पथ पर अवश्य आगे बढ़ पाएंगे वरना वहीं का वहीं रह जायेंगे.
“स्वामी सौमित्राचार्य”

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