卐 सत्यराम सा 卐
*जांण जांण जांण्यां नहीं, ऐसी उपजै आइ ।*
*बूझ बूझ बूझ्या नहीं, ढोरी लागा जाइ ॥*
*खेल खेल खेल्या नहीं, सन्मुख सिरजनहार ।*
*देख देख देख्या नहीं, दादू सेवक सार ॥*
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com
नैतिक मनुष्य के कष्ट का कोई अंत नहीँ क्योँकि उसका मन तो होता है दुर्जन जैसा और आचरण होता है संत जैसा। इसीलिये वो बड़ी दुविधा में जीता है। उसके भीतर द्वंद सदा बना रहता है। नैतिक को पीड़ा सदा बनी ही रहती है। और यदि नैतिकता पीड़ा दे रही है तो साफ है कि भीतर से चाहता तो वह भी वही है जो दुर्जन कर रहा है, लेकिन नैतिकता का आचरण उसने बना रखा है। लोभ ये भी है उसे कि धन, यश, पद मिल जाए, अहंकार की भी तृप्ति हो। दुर्जन के जो लोभ हैँ, वे उसके भी लोभ हैँ। लोभ ये भी है कि परमात्मा, आत्मा, मोक्ष, आनंद, शांति मिल जाए। जो संत की अभीप्सा है, वह भी उसका लोभ है।
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इन दोनो के बीच वह परेशान है। इसीलिये नैतिक बड़ी अशांति मे रहता है। जीवन्मुक्त है संत, इसलिये नहीं दूसरे के साथ बुराई कर रहा है कि बुरा करने से स्वयं का बुरा होगा कभी। नहीँ, वह बुरा कर ही नहीँ सकता क्योँकि वह अब द्रष्टा में स्थित हो चुका है। 'जिसने ब्रह्म तत्व को जान लिया, उसकी दृष्टि मे संसार पहले जैसा नहीँ रहता। इसलिये यदि वह संसार को पूर्ववत ही देखता हो, तो निश्चित है कि उसने अभी ब्रह्म को जाना नहीँ और वह बहिर्मुखी है।'
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मनुष्य बदला कि उसका संसार भी बदला। जीवन-मुक्ति के अनुभव मे जहां-2 संसार मे मेरा आरोपित था, वह तिरोहित हो जाएगा। वह जो मेरा ममत्व था, जो मेरा राग था, वही दुख था, पीड़ा थी। वही मनुष्य की बुद्धि बीच मे खड़ी हो जाती थी। मेरा बीच मे आ जाता है और मनुष्य पर्दे से देखता था।
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अब संसार संसार है, मैँ हूं। सारा ममत्व क्षीण हो जाएगा। सारी संगृहीत धारणाएं क्षीण हो जाएंगी। संसार के साथ जो-2 प्रक्षेपण थे मनुष्य के, वे नष्ट हो जाएंगे। जगत से जो अपेक्षाएं थी, वे भी गिर जाएंगी। जो मांग थी, वह भी नहीँ रह जाएगी। जगत में जो सुख को देखने का ख्याल था, वह भी चला जाएगा। जगत से दुख मिलता है, ये भ्रांति भी टूट जाएगी। जगत से कोई लेन-देन है, ये भी समाप्त हो जाएगा। 'जिसने जान लिया ब्रह्म को, उसकी दृष्टि मे संसार पहले जैसा नहीँ रहता।'
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संसार तो रहता है, पहले जैसा नहीँ रहता। और अब भी पहले जैसा रह जाए, तो जाने मनुष्य कि उसने अभी जाना नहीँ। ये स्वयं की परीक्षा के लिए है। ये कसौटी है। इसे खोजता रहे मनुष्य निरंतर कि कहीँ वैसे का वैसा तो नही है सब? यदि भीतर ढंग वही चल रहा है,सब वैसा ही दिखाई दे रहा है, तो जीवन्मुक्ति अभी दूर है, सत्य अभी दूर है।

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