卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी*
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*साधु का अँग १५*
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विष का अमृत कर लिया, पावक का पाणी ।
बांका सूधा कर लिया, सो साधु बिनाणी१॥११८॥
जो पहले अन्त:करण की वृत्ति विषयाकार
होने से विष रूप थी, उसे ब्रह्माकार करके जिसने अमृत कर लिया, क्रोधाग्नि
को क्षमा रूप जल बना लिया, भगवत् से विमुख चलने वाले मन को
विचार द्वारा सरल करके भगवान् के सम्मुख कर लिया, वही
विज्ञानी१ सन्त है ।
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दादू ऊरा१ पूरा कर लिया, खारा मीठा होइ ।
फूटा सारा कर लिया, साधु विवेकी सोइ ॥११९॥
दैवी गुणों की सँख्या जो कम१ थीं उसे
दैवी गुणों की वृद्धि से परिपूर्ण किया, विषय - वासना रूप खारेपन को हटा कर मधुर
भक्ति - रस से अन्त:करण को मधुर बनाया, आशा रूप छिद्र के
वैराग्य रूप लाख लगा कर अन्त:करण - घट को ब्रह्मज्ञान - रस रहने योग्य बनाया,
वही विवेकी सन्त है ।
बँध्या मुक्ता कर लिया, उरझ्या सुरझ समान ।
बैरी मिंता कर लिया, दादू उत्तम ज्ञान ॥१२०॥
काम - क्रोधादि शत्रुओं को आत्म - सँयम
द्वारा शान्त मित्र बना दिया वो आसुर गुण - शत्रुओं को दैवी गुणों में बदल दिया, मोह - ममता से आबद्ध मन
को वैराग्य द्वारा खोल दिया और अज्ञान साँसारिक जाल में उलझे जीव को ज्ञान द्वारा
सुलझा कर ब्रह्म समान बना दिया, वही उत्तम ज्ञान युक्त सन्त
है ।
(क्रमशः)

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