सोमवार, 18 दिसंबर 2017

= १२ =


#daduji

卐 सत्यराम सा 卐

*दादू जब तैं हम निर्पख भये, सबै रिसाने लोक ।*

*सतगुरु के परसाद तैं, मेरे हर्ष न शोक ॥*

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साभार ~ ओशो गंगा/ Osho Ganga

वाग्मिप्राज्ञामहोद्योगं जनं मूकजडालसं।
करोति तत्त्वबोधोऽयम-तस्त्यक्तो बुभुक्षभिः॥
'यह तत्वबोध वाचाल, बुद्धिमान और महाउद्योगी पुरुष को गुंगा, जड़ और आलसी कर जाता है। इसलिए भोग की अभिलाषा रखने वालों के द्वारा तत्वबोध त्यक्त है।’
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'यह तत्वबोध वाचाल, बुद्धिमान और महाउद्योगी पुरुष को गुंगा, जड़ और आलसी कर जाता है। इसलिए भोग की अभिलाषा रखने वालों के द्वारा तत्वबोध त्यक्त है।’


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अष्टावक्र कहते हैं कि यह तत्वबोध, यह संसार के रस से मुक्त हो जाना, यह मोक्ष का स्वाद मिल जाना, यह स्वच्छंदता, यह विज्ञान वाचाल को मौन कर देता है, बुद्धिमान को ऐसा बना देता है कि जैसे लोग समझें कि जड़ हो गया; महाउद्योगी को ऐसा कर जाता है जैसे आलसी हो गया। इसीलिए भोग की लालसा रखने वालों के द्वारा ऐसे तत्वबोध से बचने के उपाय किए जाते हैं। वे हजार उपाय करते हैं। वे हजार कोस दूर भागते रहते हैं। वे आत्मवानों के पास नहीं फटकते। वे तो आत्मवानों की छाया भी अपने ऊपर पड़ने नहीं देना चाहते, क्योंकि इसमें उनके अहंकार को चोट मिलती है।
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यह श्लोक कठिन है। हमारी जो बुद्धिमानी है, वह सांसारिक है; वस्तुत: बुद्धिमानी नहीं है। क्योंकि जिस बुद्धि से मोक्ष न मिले, जिस बुद्धि से स्वतंत्रता न फलित हो और जिस बुद्धि से सच्चिदानंद का अनुभव न हो, उसे क्या खाक बुद्धि कहना? फिर मूढ़ता किसको कहेंगे? जिसे हम बुद्धिमानी कहते हैं, जिसे हम चालाकी कहते हैं, अंतिम अर्थों में वही मूढ़ता है। इसलिए जो अंतिम अर्थों में बुद्धिमानी है, वही मूढ़ता जैसी लगती हैं।
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अष्टावक्र कहते हैं कि कामी, भोगी तत्वज्ञान के पास नहीं फटकना चाहते, क्योंकि उन्हें डर लगता है कि तत्वज्ञानी तो खतरे पैदा कर देता है। तत्वज्ञान की जरा सी छाया पड़ी कि महत्वाकांक्षा गई। महत्वाकांक्षा गई तो दौड़ गई, सामने हीरा भी पडा रहे तत्वज्ञानी के तो वह उठ कर उठाएगा नहीं। तो यह तो हालत आलस्य की हो गई। महत्वाकांक्षी समझेगा कि यह हद आलस्य हो गया, सामने हीरा पड़ा था, जरा हाथ हिला देते। कान बंद करने की बहुत विधियाँ हैं। वे अनेको तर्क खोज लेते हैं कि ये सही नहीं। उनका कहना भी ठीक है। क्योंकि जिस दिशा में वे जा रहे हैं, ये बातें उस दिशा से बिलकुल ही विपरीत हैं।
जय सनातन।

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