सोमवार, 18 दिसंबर 2017

= ११ =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*द्वन्द बिना विचरै वसुधा पर,*
*जा घट आतम ज्ञान अपारो ।*
*काम न क्रोध न लोभ न मोह न,*
*राग न द्वेष न म्हारो न थारो ।।*
*योग न भोग न त्याग न संग्रह,*
*देह दशा न ढक्यो न उघारो ।*
**सुन्दर** कोउक जान सकै यह,*
*गोकुल गांव को पैंडो हि न्यारो ।।*
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साभार ~ ओशो गंगा/ Osho Ganga



अष्टावक्र कहते हैं, की हे जनक, तू शरीर नहीं है, न तेरा शरीर है और तू भोक्ता और कर्ता भी नहीं है। तू तो चैतन्यरूप है, नित्य साक्षी है, निरपेक्ष है, तू सुखपूर्वक विचर। 
अष्टावक्र कहते हैं, अरे जनक तू तो है चैतन्य हैं, तू तो है नित्य साक्षी हैं, निरपेक्ष, ऐसा जान कर तू सुख से विचर। न तू भोक्ता हैं, न तू शरीर हैं, न तेरा शरीर हैं, तू तो भीतर जो छिपा हुआ साक्षी है, बस वही है। 
 अष्टावक्र कहते हैं, की हे जनक, राग और द्वेष मन के धर्म हैं। मन कभी तेरा नहीं। तू निर्विकल्प, निर्विकार, बोधस्वरूप है। तू सुखी हो।’
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परंतु मन बहुत पास है चेतना के। और जैसे दर्पण के पास कोई चीज रखी हो तो दर्पण में प्रतिबिंब बन जाता है, ऐसे ही शुद्ध चेतना में मन का प्रतिबिंब बन जाता है। सब खेल मन का है। मन के हटते ही दर्पण कोरा हो जाता है। उस कोरे को जान लेना ही ब्रह्मज्ञान है। वही विज्ञान है।
एतावदेव विज्ञानं।
परंतु मन पास है, और मन में तरंगें उठती रहती हैं और तरंगों की छाया चैतन्य पर बनती रहती है। जब तक हम मन की तरंगों को साक्षी भाव से देखेंगे नही, तब तक सुद्ध चेतन्य को नही जान पाएंगे। 
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और साक्षी भाव को समझ लेना। मन में कामवासना उठी; हमने यदि कहा, बुरी है कामवासना तो साक्षी भाव खो गया। हमने तो निर्णय ले लिया। हम तो जुड़ गये, विपरीत जुड़ गए; लड़ने लगे। हमने कहा, भली कामवासना है, तो भी साक्षी भाव खो गया। कामवासना उठी; न हमने कहा भली, न हमने कहा बुरी; हमने कोई निर्णय न लिया, हम केवल देखते रहे, हम केवल देखने वाले रहे, हम जरा भी जुड़े नहीं। 
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न प्रेम में न घृणा में, न पक्ष में न विपक्ष में, हम केवल देखते रहे, यदि हम क्षण भर भी देखते रह जाये तो चकित होजाएंगे। हमारे देखते रहने में ही धुएं की तरह वासना उठी और खो भी गई। और उसके खोते ही पीछे जो शून्य रिक्त छूट गया था, अपूर्व है उसकी शांति, उसका आनंद, उसका अमृत अपूर्व है, और उसके कण-कण हम इक्कट्ठा करते जाएँ, तो धीरे- धीरे हम बदलते जायेंगे। एक-एक बूंद शून्य की इक्कठी करके किसी दिन हमारा घड़ा अमृत से भर जाएगा।

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