सोमवार, 18 दिसंबर 2017

= ज्ञान-झूलनाष्टक(ग्रन्थ २६-१) =

 
🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= ज्ञान-झूलनाष्टक(ग्रन्थ २६) =*
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*झूलना छन्द१*
*उस्ताद के कदम सर पै धरौं,*
*अब झूलना खूब बखानता हैं ।*
*अरवाह मैं२ आप विराजता है वह,*
*जानका जान है जानता हूँ ॥*
*उसही के डुलायै डोलता हूँ,*
*दिल खोलता बोलता मानता हूँ ।*
*उसही के दिखाये मैं देखता सुनता,*
*सुन्दर यौं पहिचानता हूँ ॥ १ ॥*
(१. झूलना छन्द—यह वर्णिक और मात्रिक दोनों होता है और कई प्रकार का होता है । शुद्ध झूलना ७ सगण + १ यगण का है । यहाँ यह २४ अक्षर और अन्त यगण का है, और इसमें यगण सगण मिश्रितप्राय है ।)
{२. अरवाह मैं -सूफीमत में मलकूत’ को ‘मकामे अरवाह’ कहा है -(अ०) ‘रूह’ का बहुवचन । आत्माओं में जान का जान=जीव का भी तत्त्वात्मा -“जान का जान है जिन्द का जिन्द है”(सवैया) जाग = जग्य, यज्ञ । विष्णु का नाम - “ यज्ञो वै विष्णुः”(श्रुति) । यज्ञ एक साधन है ।} 
इस ग्रन्थ में सद्गुरु के चरणों की वन्दना करके झूलना छन्द में उस परम तत्व का विस्तार से वर्णन करूँगा । वह परम तत्व(परब्रह्म) प्रत्येक जीवात्मा में व्याप्त है, अपितु यों कहिये कि वह इस जीवात्मा का भी प्राण(तत्व) है ।
मैं उसी ब्रह्म तत्व के सहारे अपनी सारी चेष्टाएँ- हँसना, बोलना, चिन्तन करना, देखना आदि करता हूँ ।(मेरी सभी इन्द्रियाँ उसी के सहारे से अपने-अपने कर्म में लिप्त हैं ।) मैंने उस परम तत्व के बारे में यही समझा है ॥१॥
(क्रमशः)

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