गुरुवार, 7 दिसंबर 2017

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#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*सहज शून्य सब ठौर है, सब घट सबही माहिं ।*
*तहाँ निरंजन रम रह्या, कोई गुण व्यापै नाहीं ॥* 
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com
'आकाश के समान अपने को असंग तथा उदासीन जान कर सिद्ध भविष्य के कर्मोँ मे लेशमात्र लिप्त नहीँ होता।'
'आकाश के समान अपने को असंग तथा उदासीन जान कर...।'
एक पक्षी आकाश मे उड़ता है, कोई चिन्ह पीछे नहीँ छूटता। जमीन पर चलते हैँ, पदचिन्ह छूट जाते हैँ। गीली हो जमीन, और गहरे छूट जाते हैँ। पक्षी उड़ जाता है, आकाश वैसे का वैसा होता है जैसा पक्षी के उड़ने के पहले था। कोई उपाय नहीँ है पता लगाने का कि पक्षी यहां से उड़ा है। आकाश मे बादल घिरते हैँ, आते हैँ, चले जाते हैँ, आकाश वैसा ही बना रहता है जैसा था। आकाश को अशुद्ध करने का, संस्कारित करने का, आकाश मे निशान बनाने का कोई उपाय नहीँ है।
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पानी मे बनाते हैँ लकीरेँ, बनती हैँ, बनते ही मिट जाती हैँ। पत्थर पर बनाते हैँ,बनती हैँ, मिटने मे वर्षोँ लग जाते हैँ। आकाश मे लकीर बनती ही नहीँ, मिटने का कोई प्रश्न ही नहीँ। जिस क्षण कोई मन के पार चला जाता है, उस क्षण अनुभव में आता है कि चेतना पर आकाश की भांति अब तक कोई भी-कोई भी-संस्कार निर्मित नहीँ हुए हैँ; ये सदा से शुद्ध, इस पर कोई विकृति घटित नहीँ हुई है।
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**असंग महत्वपूर्ण शब्द है।**
इसका अर्थ है, सबके साथ फिर भी साथ नहीं है। जो सार था-श्रीराम हुए, भारत ने इसकी फिक्र नहीँ की कि कब हुए, कब पढ़ने गए, कब विवाह हुआ, क्योँकि इस सबका हिसाब रखने का प्रयोजन कुछ मालूम नहीँ पड़ा। लेकिन श्रीराम के होने की भीतरी घटना जो घटी-कि एक मनुष्य परमात्मा हो गया, एक दीप जल उठा और संसार को प्रकाशित कर गया-भारत ने केवल इतना स्मरण रखा। इतना मात्र स्मरण रखा कि चेतना के जो दीपक प्रकाशित नहीँ है, वे सभी प्रकाशित हो सकते हैँ। मनुष्य जीवन मे सुगंध भी हो सकती है - इसका हिसाब इस भारत भूमि ने रखा और बाकी सब व्यर्थ को छोड़ दिया।
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भारतीय देशना को भगवान राम के होने मे कोई प्रयोजन नही है। श्रीराम जैसी घटना घट सकती है, केवल इतना स्मरण रखा। भगवान श्रीकृष्ण हो सकते हैँ, हुए को भी केवल इसलिये स्मरण रखते हैँ जिससे याद रहे कि हो सकते हैँ, मनुष्य के भीतर ये फूल खिल सकता है, भीतर आनंद का झरना फूट सकता है; इसलिये पुराण रचे-पुराण का अर्थ है - वह जो सारभूत है, उतना ही।
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चेतना मे प्रवेश करके ज्ञात होता है कि आकाश मे कोई चिन्ह नही छूटता, लेकिन जो सार है वह छूट जाता है। वह इसलिये छूट जाता है क्योँकि वह आकाश से विजातीय नहीँ है। वह आकाश है मनुष्य के भीतर का जिसे आत्मा कहते हैँ।

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