रविवार, 3 दिसंबर 2017

= १९७ =


卐 सत्यराम सा 卐
*निश्चल सदा चलै नहिं कबहूँ, देख्या सब में सोई ।*
*ताही सौं मेरा मन लागा, और न दूजा कोई ॥* 
*आदि अनन्त सोई घर पाया, अब मन अनत न जाई ।*
*दादू एक रंगै रंग लागा, तामें रह्या समाई ॥* 
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साभार ~ oshoganga.blogspot.com 
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स्वयं के और परम के बीच-वह जो भीतर छिपा जीव है वह, और वह जो विराट मे छिपा हुआ ब्रह्म है वह-दोनो के बीच जिसे कोई भी भेद बुद्धि के द्वारा दिखाई नहीँ पड़ता, वह जीवन्मुक्त कहलाता है। कोई भेद दिखाई नहीँ पड़ता, बुद्धि के द्वारा। सभी भेद बुद्धि के द्वारा दिखाई पड़ते हैँ।बुद्धि ही भेद करने की व्यवस्था है।
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जैसे जल मे कोई भी सीधी लकड़ी या अन्य वस्तु डालेँ, वह तिरछी दिखाई पड़ेगी। तिरछी है नहीँ, ये देखने वाले को भी पक्का पता है। हजार बार बाहर निकाल कर देख लेँ, फिर जल मे डाल देँ, पानी के अंदर हाथ डाल कर भी लकड़ी को देख लेँ तो वह सीधी ही प्रतीत होती है - हाथ को, लेकिन तिरछी ही दिखाई पड़ती है;क्योँकि जल का माध्यम और हवा का माध्यम किरणोँ के लिये यात्रा-पथ बदल देता है।
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बुद्धि भेद निर्मात्री है। प्रकाश को बुद्धि से देखने के कारण दो हिस्से-अंधेरा और उजाला, हो जाते हैँ। अंधेरे और उजाले मे कोई फर्क नही है, दोनो एक का ही क्रमिक विस्तार है। इसीलिये उल्लू अंधेरे मे भी देख सकता है। उल्लू देख पाता है अंधेरे मे क्योँकि अंधेरा भी सूक्ष्म प्रकाश है और उल्लू की आंखे उसको पकड़ने मे समर्थ है। मनुष्य की आंखे भी एकदम महाप्रकाश आ जाए तो अंधेरे मे डूब जाएंगी क्योँकि उतना प्रकाश आंख देख नहीँ पाती हैँ। जितने दूर के प्रकाश को देखने की क्षमता है आंखो की - वह है उजाला - उसके इस पार भी अंधेरा, उस पार भी अंधेरा। 
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बुद्धि प्रत्येक को दो मे बांट देती है।
बुद्धि है विश्लेषण,
बुद्धि है भेद,
बुद्धि है विभाजन।
इसीलिये जन्म और मृत्यु दो दिखाई देते हैँ, दो हैँ नहीँ। जन्म है प्रारंभ, मृत्यु उसी का अंत है। दो छोर हैँ, एक ही घटना के। अभी प्रेम है, अभी घृणा हो जाती है। अभी लगाव था, अभी विकर्षण लगता है। अभी मित्रता थी, अभी शत्रुता हो जाती है। वे दो नहीँ है, नहीँ तो रुपांतरण अंसभव था। प्रति क्षण ये बदलाहट चलती रहती है। बुद्धि का ढंग है कि प्रत्येक दो मे विभाजित हो जाता है। बुद्धि को हटाकर जो जगत को देखता है, उसे सारे भेद तिरोहित हो जाते हैँ।
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अद्वैत का, वेदांत का सार-अनुभव उन्ही लोगोँ का अनुभव है, जिन्होने बुद्धि को हटा कर जगत को देखा। फिर जगत ब्रह्म हो जाता है। तब जो भीतर जीव है और जो वहां ब्रह्म प्रतीत होता था, वे भी एक का ही दो छोर हो जाते हैँ। लेकिन बुद्धि को अलग करके देखेगा मनुय, तभी। ये जरा मुश्किल है, क्योँकि जब भी मनुष्य देखता है, बुद्धि से ही देखता है। बुद्धि के अतिरिक्त मनुष्य देखेगा कैसे? कुछ भी देखे, विचार बीच मे अवश्य आएगा। बुद्धि के पार उठने के लिये गहन अभ्यास की जरुरत है।

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