🌷🙏🇮🇳 *#daduji* 🇮🇳🙏🌷
🙏 *श्री दादूदयालवे नमः ॥* 🙏
🌷 *#श्रीसुन्दर०ग्रंथावली* 🌷
रचियता ~ *स्वामी सुन्दरदासजी महाराज*
संपादक, संशोधक तथा अनुवादक ~ स्वामी द्वारिकादासशास्त्री
साभार ~ श्री दादूदयालु शोध संस्थान,
अध्यक्ष ~ गुरुवर्य महमंडलेश्वर संत श्री १०८ स्वामी क्षमारामजी महाराज
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*= अजब ख्याल अष्टक(ग्रन्थ २५) =*
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*= छंद =*
*दुरवेश५ दर की खबर जानै,*
*दूर दिल की काफ़ीरी ।*
*दर दरदबंद६ खरादरुनै७,*
*उसी बीच मुसाफिरी८ ॥*
*है बेतमा१ इसमाइ२ हर्द्दम,*
*षाक दिल दर हाल३ है ।*
*यौं कहत सुन्दर कब्जदुन्दर,*
*अजब ऐसा ख्याल है ॥२॥*
{५. दुरवेश = इस शब्द से यह सांकेतिक वा श्लेषार्थ निकलता है - यथा -
(क) ‘दुर’ वा अन्दर में ‘वेश’ प्रवेश करै अर्थात् ‘दर की वा दिल की खबर रक्खै’ और
(ख) ‘दुर’ वा दूर ‘देश’ बैठने वाला, अर्थात् ईश्वर से दूर रहना दिल की काफ़िरी व राम = विमुखता है ।}
(६. दरदबन्द = दर्दमन्द, दिल में परमात्मा के मिलने के विरह का दर्द ।)
(७. षरादरूनै - खरा, साफ़ शुद्ध । दरूनैं = करूँ, अन्तरंग, अन्तःकरण ।)
(८. मुसाफिरी = फकीरी ।) (१. बेतमा = निर्लोभ ।) {२. (इसमाइ = भगवन्नाम की रटना ।)} (३. दरहाल = हर वक्त, निरन्तर ।)
(महात्मा ‘दुरवेश’ शब्द का विश्लेषण कर रहे हैं -- ।)
‘दुरवेश’ उसे कहना चाहिये जो दर(अन्तःकरण) की गतिविधियों पर कठोर नियन्त्रण रखे(कि उसका दिल माया-मोह में प्रमत्त न हो और पवित्र रहे) और अपने अन्तःकरण को ईश्वर से दूरीभाव (= रामविमुखता) से दूर रखे । उसमे परमात्मा से मिलने के लिये विरह(दर्द रहे) और उसे पवित्र(माया-मोह से रहित) रखे । उसी शुद्ध अन्तःकरण में संसार से वैराग्य-भावना रखता हुआ निरन्तर राम नाम का जप करै; क्योंकि वासनारहित अन्तःकरण से भगवान् का नाम जपना ही पवित्र मन वाले संन्यासी का प्रथम कर्तव्य है । ऐसा पवित्र हृदय भक्त ही सांसारिक द्वन्द्वों पर विजय पा सकता है ॥२॥
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*= दोहा =*
*सुन्दर सीनै बीच है, बन्दे का चौगान ।*
*पहुंचावै उस हाल कौं, इहै गोइ४ मैदान ॥४॥*
{४. गोइ = गेंद(दड़ी)}
भक्त अपने पवित्र अन्तःकरणरूपी मैदान में रामनाम के जपरूपी गैंद को उस लक्ष्य तक पहुँचा दे कि उसे इसके सहारे भवसागर से मुक्ति मिल सकती है ॥४॥
(क्रमशः)

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