#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू जल में गगन,*
*गगन में जल है, पुनि वै गगन निरालं ।*
*ब्रह्म जीव इहिं विधि रहै, ऐसा भेद विचारं ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*समर्थता का अंग ५१*
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प्रभाकर१ प्रतिबिम्ब परि, ब्रह्म जीव पहचान ।
कहां सु झरि झाँई भई, समझो संत सुजान ॥९॥
सूर्य१ से प्रतिबिम्ब पड़ता है तब क्या वह परछाई झड़कर पड़ती है ? अर्थात नहीं, हे सुजान संतों ! वैसे ही ब्रह्म से जीव को पहचानो ।
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सब पृथ्वी प्रतिबिम्ब परि, प्रभू प्रभाकर जानि ।
तो रज्जब हरि हंस१ में, हेरि हुई कछु हानि ॥१०॥
सभी पृथ्वी पर सूर्य का प्रतिबिम्ब पड़ता है, फिर भी सूर्य१ की कुछ हानि नहीं हुई है, वैसे ही अनेक शरीर में प्रभु का जीव रूप से प्रतिबिम्ब पड़ने से हरि की कुछ भी हानि नहीं होती, उनकी ऐसी ही अद्भुत सामर्थ्य है ।
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अचल चलावै सबन को, आप न चंचल होय ।
रज्जब खपै न खेवटा, वोहिथ विचरै जोय ॥११॥
जहाज जीर्ण होकर टूट जाय तो भी केवट नष्ट नहीं होता है, वैसे ही परमात्मा आप अचल है सब संसार को चलाते हैं किन्तु आप चंचल नहीं होते ।
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करता हरता दुहुन का, अरु दोन्यों तैं दूरि ।
निरालम्ब१ न्यारा रहै, सब ठाहर भरपूरि ॥१२॥
ईश्वर स्थूल सूक्ष्म दोनों प्रकार के संसार को उत्पन्न तथा नष्ट करने वाला है और दोनों से दूर, सबसे अलग, निराश्रय१ और सबसे परिपूर्ण रूप से रहता है ।
(क्रमशः)

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