#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू ब्रह्म जीव हरि आत्मा, खेलैं गोपी कान्ह ।*
*सकल निरन्तर भर रह्या, साक्षीभूत सुजान ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*साक्षी भूत का अंग ५०*
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काठहिं तोड़े काठ पर१, अग्नि चोट में नाँहिं ।
रज्जब गुण सौं गुण विलय, निर्गुण न्यारा माँहिं ॥२१॥
काष्ठ को काष्ठ तोड़ता है परन्तु१ अग्नि उन चोटों के आधात में नहीं आता अर्थात अग्नि के चोट नहीं लगती, वैसे ही गुण से गुण लय होता है, निर्गुण तो गुणों में रहकर भी उन से अलग ही रहता है ।
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आतम लोहा कूटिये, गुण देही घण मार ।
रज्जब रमता अग्नि में, ता को दुख न लगार१ ॥२२॥
लोहे को घण की चोटों से कूटते हैं तब उसमें रहने वाले अग्नि पर उन चोटों की मार कहां पड़ती है ? अर्थात नहीं पड़ती, वैसे ही देह के गुणों से देह में रमने वाले आत्मा को किंचित१ भी दु:ख नहीं होता ।
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पिंड प्राण दोनों तपहिं, यथा कड़ाही तेल ।
रज्जब हरि शशि ज्यों रहैं, अग्नि मध्य नहिं मेल ॥२३॥
जैसे अग्नि से कड़ाही और तेल दोनों तपते हैं किन्तु गर्म में दीखने वाले चन्द्र प्रतिबिम्ब का तेल द्वारा अग्नि से मेल होने पर भी वह नहीं तपता, वैसे ही शरीर और प्राण दोनों दु:खों से व्यथित होते हैं किन्तु साक्षी रूप हरि तो शरीर तथा प्राणों में रहते हुवे भी दु:खों से दुखित नहीं होते ।
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रज्जब आतम आभ१ के, पिशुन२ सु अंतक पौन३ ।
पर शून्य४ स्वरूपी सांइयाँ, तिसहिं धकावे कौन ॥२४॥
बादलों१ के लिये वायु साक्षी भूत दुष्ट२ है, उन्हें छिन्न भिन्न कर देता है । जीवात्माओं के लिये यमराज दुष्ट है, उन्हें मार देता है, किन्तु साक्षी रूप प्रभु तो आकाश४ के समान हैं, उन्हें कौन धक्का लगा सकता है ? अर्थात कोई भी नहीं ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित साक्षी भूत का अंग ५० समाप्त ॥ सा. १७३५॥
(क्रमशः)

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