बुधवार, 28 नवंबर 2018

= पारिख का अँग(२७ - १०/१२) =

 #daduji 
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*पारिख का अँग २७* 
दादू ऊपर देख कर, सब को राखे नाँव ।
अंतरगति की जे लखैं, तिनकी मैं बलि जाँव ॥१०॥
सभी अज्ञानी प्राणी शरीर के ऊपर की भेषादि प्रवृत्ति को देखकर "सँत", आदि नाम रखते हैं, किन्तु जो मन की भावना रूप गति को देखकर नाम रखते हैं, उनकी हम बलिहारी जाते हैं ।
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जग जन विपरीत
तन मन आतम एक है, दूजा सब उनहार ।
दादू मूल पाया नहीं, दुविध्या भरम विकार ॥११॥
११ - १४ में सँसारी जनों की और सँतों की विपरीतता दिखा रहे हैं, सभी प्राणियों के स्थूल - शरीर स्थूल - भूतों से और अन्त:करण सूक्ष्म - भूतों से बने हुये होने से एक हैं, और आत्मा सब का चेतन होने से एक है । बाह्म भेष से भी एक - से दिखाई देते हैं । भिन्न - भिन्न तो केवल स्थूल शरीर की आकृततियां तथा अन्त:करण की भावनाएं ही हैं । किन्तु जिन - जिन ज्ञानियों ने इस मे तत्व को नहीं समझा, वे भ्रम जन्य विकारों से दूविधा में पड़े हुये हैं और मूल तत्व को जानने वाले सँत उक्त दुविधा से अलग हैं । यही सँत असँतों में विपरीतता है ।
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काया के सब गुण बंधे, चौरासी लख जीव ।
दादू सेवक सो नहीं, जे रंग राते पीव ॥१२॥
चौरासी लक्ष योनियों के सभी जीव कामादि गुणों से बंधकर देहाध्यासी बने हुये हैं किन्तु जो परमात्मा की भक्ति रँग में रत हैं वे सँत शरीर के सेवक नहीं होते, यही विपरीतता है । 
(क्रमशः)

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