मंगलवार, 27 नवंबर 2018

= साक्षी भूत का अंग ५०(१७/२०) =

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卐 सत्यराम सा 卐
*बिन गुण व्यापे सब किया, समर्थ आपै आप ।*
*निराकार न्यारा रहै, दादू पुन्य न पाप ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*साक्षी भूत का अंग ५०*
मजलिस१ का मोती सु ब्रह्म, मुक्ता मांड२ सु माँहिं । 
रज्जब दीसे दिल सकल, लिपै छिपै सो नांहिं ॥१७॥ 
प्रदर्शनार्थ काच की आलमारी में रखे हुये महफिल१ के मोती के समान ब्रह्म है, जैसे वह मोती सबके बीच रखा रहता है्, सबको दीखता है, किसी के द्वारा सदोष नहीं होता और न किसी से छिपता है, वैसे ही ब्रह्म ब्रह्माण्ड२ में रहते हुए गुण दोषों से मुक्त है किसी से लिपायमान नहीं होता, सबके अन्त:करण में साक्षी रूप से भासता है । 
दर्पण मय दरिया प्रभु, देव१ दृष्टि पणिहार । 
रज्जब रुचि कलशौ भरैं, मुख सुख सलिल विचार ॥१८॥ 
साक्षी ब्रह्म दर्पण और दरियाव रूप हैं, दृष्टि तथा ब्रह्म-विचार१-दृष्टि पणिहारी रूप है, जैसे पणिहारी दरिया से कलशों में जल भरती है, वैसे ही दृष्टि दर्पण में मुख देखने का सुख अपनी वृत्ति में भरती है और ब्रह्म-विचार-दृष्टि साक्षी रूप प्रभु का सुख अपनी प्रीती में भरती है अर्थात साक्षी रूप प्रभु-प्रेम से सुखी रहती है । 
सकल मांड१ सो दूध गति, गुटके४ गति गोपाल । 
रज्जब पी भारी नहीं, उगल२ न हलका लाल३ ॥१९॥ 
संपूर्ण ब्रह्माण्ड१ दूध के समान है, साक्षी ब्रह्म पारा की गोली४ वा पाचक औषधी की गोली के समान है, जैसे दूध में पारा की गोली डाल कर वा औषधी की गोली खाकर दूध पीने से वह दूध भारी नहीं पड़ता, हलका हो जाता है, उसकी वमन२ होने का कष्ट नहीं होता, वैसे ही साक्षी ब्रह्म३ के चिन्तन करने से संसार दु:खप्रद नहीं होता, ब्रह्मरूप भासने से सुखद ही होता है । 
रुचि नाँहीं अरू सब भखै, रुचि है कछु न खाय । 
रज्जब ऐसा राम है, जैसा अग्नि स्वभाय ॥२०॥ 
अग्नि की रुचि जलाने की न होने पर जो भी डाल दोगे वह सब भस्म कर देगा और रुचि होने पर भी उस पर न डालने से वह कुछ भी नहीं जलाता, जैसे अग्नि का स्वभाव है, वैसा ही साक्षी रूप राम का है वह रुचि न होने पर भी भक्तों का दिया हुआ सब खा जाता है और रुचि होने पर भी अभक्तों का नहीं खाता ।
(क्रमशः)

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