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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
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(५) (पंजाबी भाषा)
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*आव असाडे यार तूं चिरकि कूं लाया ।*
*हाल तुसा मालूम है तनु जौबन आया ॥टेक॥*
*जदि मैं हौं दीनि कडी तद कुझ न जाना ।*
*हुंण मैंनौं कल ना पवै सभ षेड भुलाना ॥१॥*
आवो हमारे मीत, विलम्ब क्यों कर रहे हो । तुम्हें यह ज्ञात ही है कि मैं सयानी हो गयी हूँ । यदि मैं छोटी(नदान) होती तो कुछ नहीं जानती । मैं सारे खेल भूल गयी हूँ । मुझे चैन नहीं पड़ता ॥१॥
*मा मैं नू ई आषदी तूं धीय असाडी ।*
*प्यौदी गल्ह अभावणी मैं सभो छाडी ॥२॥*
माता मुझसे कहती है कि तूँ हमारी बेटी है । पिता की बात, सम्झावन मैं सबको छोड़ चुकी हूँ ॥२॥
*हिक्क सहा उभि राउदा मैं नू संमुझावै ।*
*नालि तुसांडे हौं चला जे कंतु न आवै ॥३॥*
एक सहायक भाई भी मुझे समझाता हो । यदि मेरा प्रिय नहीं आया तो मैं विरह में ही मर जाऊँगी ॥३॥
*जे तैंहुण आया नहीं तामैं हुंणु आंवां ।*
*सुन्दर आषै बिरहनी मनु कित्थं लांवां ॥४॥*
प्रिय के नहीं आने पर मैं ही प्रियतम के पास जाऊँगी । सुन्दरदासजी कहते हैं कि विरहनी प्रियतम को छोड़ कर अपने मन को कहाँ लगावे ॥४॥
(क्रमशः)

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