🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*धनि धनि साहिब तू बड़ा, कौन अनुपम रीत ।*
*सकल लोक सिर सांइयां, ह्वै कर रह्या अतीत ॥*
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साभार ~ Gyan Aur Bhakti
प्रकाश, ऊर्जा, आनन्द और सकल सामर्थ्य का स्रोत मनुष्य स्वयं ही है। अतः स्वयं का बोध हो ! अपनी निजता के बोध का फलादेश है - अनन्तता और अतुल्य सामर्थ्य का अनुभव। आत्म-स्वरूप का बोध और स्वयं की निजता में जीवन जीने का अभ्यास महती उपलब्धि है।
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आत्माभिमुखी बनें ! स्मृति का, बोध का शब्दार्थ है - याद बनी रहे। आपके चिंतन, धारणाओं तथा अभीप्साओं में मात्र जगत ना रहे, जगन्नाथ भी रहे। अतः आपमें भगवान की याद या स्मृति हर-पल बनी रहे। कभी-कभी हम भगवान से प्रार्थना में ये बात कहें - हे देव ! आपकी कृपा से हम वंचित नहीं हैं। बस, हमें यह ध्यान बना रहे कि आपका अनुग्रह हम पर है। हम यह शिकायत करना छोड़ दें कि आपका अनुग्रह हम पर नहीं है। भगवान की कृपा हम पर है ही, बस यह बात हमारे संज्ञान में बनी रहनी चाहिए। जब यह स्मृति आपको बनी रहेगी तो आप निर्भार, निश्चिंत हो जाएंगे। आपको लगेगा कि वे सर्वशक्तिमान प्रभु हर क्षण हमारे साथ हैं, उन जैसी सामर्थ्य किसी के पास नहीं है। ऐसे में आपमें भय नहीं रहेगा, अवसाद नहीं रहेगा।
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स्मृति का अर्थ यह भी है - आत्म की स्मृति बनी रहे, देह की नहीं। हम निरंतर देह की स्मृति में बने रहते हैं। हम तो अपने को शरीर माने बैठे हैं। यह मेरा सिर है, यह मेरा वक्षःस्थल है, ये मेरी भुजाएं हैं, ये मेरे कपोल हैं, यह मेरी चिबुक है, ये मेरे नेत्र हैं और यह मैं हूँ। इन सब से ऊपर उठें, आत्मचिंतन करें तभी हमें स्वयं में छुपी विराटता का, अनंतता का बोध होगा।
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पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा कि एक बार एक भक्त ने मुझसे कहा - स्वामी जी ! आजकल मुझे बहुत डर लगने लगा है। मैं पहले नहीं डरता था, यह डर मुझमें क्यों बैठ गया है? तो मैंने कहा - आपमें और परमात्मा में कुछ दूरी आ गई है, इसलिए आपको डर लगता है। दूरी अवसाद ला रही है, यही तनाव ला रही है और यही भय भी ला रही है। इसका कारण यह है कि आपके और संत-महापुरुषों के बीच, आपके और गुरु के बीच, आपके और भगवान के बीच में कुछ दूरी आ गई है। मेरी बात उनकी समझ में आ गई और वे चिंता तथा भय से मुक्त हो गये....।
*धनि धनि साहिब तू बड़ा, कौन अनुपम रीत ।*
*सकल लोक सिर सांइयां, ह्वै कर रह्या अतीत ॥*
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साभार ~ Gyan Aur Bhakti
प्रकाश, ऊर्जा, आनन्द और सकल सामर्थ्य का स्रोत मनुष्य स्वयं ही है। अतः स्वयं का बोध हो ! अपनी निजता के बोध का फलादेश है - अनन्तता और अतुल्य सामर्थ्य का अनुभव। आत्म-स्वरूप का बोध और स्वयं की निजता में जीवन जीने का अभ्यास महती उपलब्धि है।
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आत्माभिमुखी बनें ! स्मृति का, बोध का शब्दार्थ है - याद बनी रहे। आपके चिंतन, धारणाओं तथा अभीप्साओं में मात्र जगत ना रहे, जगन्नाथ भी रहे। अतः आपमें भगवान की याद या स्मृति हर-पल बनी रहे। कभी-कभी हम भगवान से प्रार्थना में ये बात कहें - हे देव ! आपकी कृपा से हम वंचित नहीं हैं। बस, हमें यह ध्यान बना रहे कि आपका अनुग्रह हम पर है। हम यह शिकायत करना छोड़ दें कि आपका अनुग्रह हम पर नहीं है। भगवान की कृपा हम पर है ही, बस यह बात हमारे संज्ञान में बनी रहनी चाहिए। जब यह स्मृति आपको बनी रहेगी तो आप निर्भार, निश्चिंत हो जाएंगे। आपको लगेगा कि वे सर्वशक्तिमान प्रभु हर क्षण हमारे साथ हैं, उन जैसी सामर्थ्य किसी के पास नहीं है। ऐसे में आपमें भय नहीं रहेगा, अवसाद नहीं रहेगा।
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स्मृति का अर्थ यह भी है - आत्म की स्मृति बनी रहे, देह की नहीं। हम निरंतर देह की स्मृति में बने रहते हैं। हम तो अपने को शरीर माने बैठे हैं। यह मेरा सिर है, यह मेरा वक्षःस्थल है, ये मेरी भुजाएं हैं, ये मेरे कपोल हैं, यह मेरी चिबुक है, ये मेरे नेत्र हैं और यह मैं हूँ। इन सब से ऊपर उठें, आत्मचिंतन करें तभी हमें स्वयं में छुपी विराटता का, अनंतता का बोध होगा।
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पूज्य "आचार्यश्री" जी ने कहा कि एक बार एक भक्त ने मुझसे कहा - स्वामी जी ! आजकल मुझे बहुत डर लगने लगा है। मैं पहले नहीं डरता था, यह डर मुझमें क्यों बैठ गया है? तो मैंने कहा - आपमें और परमात्मा में कुछ दूरी आ गई है, इसलिए आपको डर लगता है। दूरी अवसाद ला रही है, यही तनाव ला रही है और यही भय भी ला रही है। इसका कारण यह है कि आपके और संत-महापुरुषों के बीच, आपके और गुरु के बीच, आपके और भगवान के बीच में कुछ दूरी आ गई है। मेरी बात उनकी समझ में आ गई और वे चिंता तथा भय से मुक्त हो गये....।

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