गुरुवार, 29 नवंबर 2018

= सुन्दर पदावली(१२. राग बिलावल(कायाबेली ग्रंथ ७) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
(७) 
*रे मन राम सुमरि राम सुमरि राम की दुहाई ।* 
*ऐसौ औसर बिचारि, कर तें हीरा न डारि ।* 
*पसु के लषिन निवारि, मनुष देह पाई ॥टेक॥* 
रे मन ! तुझे भगवान् की शपथ है कि अब तूँ केवल भगवान् का ही भजन कर । तूँ इस अमूल्य अवसर पर गम्भीरता से चिन्तन कर ! हाथ में आयी हीरामणि का इतनी शीघ्रता से त्याग न कर । अरे ! तुझे यह अनमोल मनुष्य शरीर मिला है । अब तो तूँ अपना यह पशुओं का आचरण छोड़ दे ॥(टेक) 
*सकल सौंज मिली आइ, श्रवन नैंन बैंन गाइ ।* 
*संतनि कौं सिर नवाइ, लेषै तनु लाई ।* 
*दासिन कौ होइ दास, छूटै सब आस पास ।* 
*कर्मनि कौ करै नास, सुद्ध होइ भाई ॥१॥* 
अब तो तुझे ये सभी दुर्लभ साधन मिले हुए हैं । अब भी क्यों नहीं तूँ अपने इन कानों से भगवान् का चरित्र सुनता है, क्यों नहीं उसका वही चरित्र अपने नेत्रों से देखता है, क्यों नहीं अपने मुख से उसका गुणगान करता है । अरे ! तूँ सन्तों की शरण में जाकर अपने इस अनमोल मानव शरीर को सफल कर ले । तूँ उस भगवान् के दासों का भी दास(सेवक) बन जा । तभी तेरा यह सांसारिक आशा का बन्धन(पाश) टूट पायगा । तेरे दुष्कृत कर्मों का नाश हो पायगा । इस रीति से तेरा यह चित्त भी शुद्ध(निर्दोष) हो पायगा ॥१॥ 
*सतगुरु की करहु सेव, जिन तैं सब लहै भेव ।* 
*मिलि हैं अविनासी देव, सकल भुवनराई ।* 
*सँमुझै अपनौं सरूप, सुन्दर है अति अनूप ।* 
*भूपति कौ होइ भूप, साँची ठकुराई ॥२॥* 
तूँ अपने सद्गुरु की सेवा कर ! उनसे ही तुझे इस संसार की अयथार्थता(मिथ्यात्त्व) का वास्तविक ज्ञान होगा । तभी तुझे उन समस्त जगत् के स्वामी अविनाशी देव का साक्षात्कार भी हो पायगा ।  जब तूँ अपने स्वरूप को समझ लेगा जो कि अतिशय अनुपम एवं श्रेष्ठ है, जब तूँ राजाओं का भी राजा तथा वास्तविक स्वामी(मालिक = ठाकुर) होने की स्थिति में आ सकेगा ॥२॥
(क्रमशः)

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