शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

= समर्थता का अंग ५१(५/८) =

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*आप अकेला सब करै, घट में लहरि उठाइ ।*
*दादू सिर दे जीव के, यों न्यारा ह्वै जाइ ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*समर्थता का अंग ५१*
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तन मन बाइक हूं बिना, माया करे सु काम । 
रज्जब सिरजी सृष्टि यूं, सब गुण रहित सु राम ॥५॥ 
जैसे तन, मन और वचन के बिना भी उक्ति प्रकार माया कार्य करती है, वैसे ही सब गुणों से रहित रहकर भी निर्गुण राम ने सृष्टि रचना की है । 
शशि सूरज हुमा संदलहिं, सत्य समर्थ गति दीन । 
तो रज्जब दातार न टोटे, कौन कला सो हीन ॥६॥ 
चन्द्रमा, सूर्य, हुमा पक्षी और चन्दन को उस सत्य समर्थ प्रभु ने शक्ति दी है तो वह दातार टोटे में नहीं है बताओ वह कौन सी कला से रहित है ? वह तो सर्व शक्तिमान है । 
महल मसाले बिना उपाये, ब्रह्माण्ड पिंड ठाहर उभै । 
याही तैं समर्थ गति१ जानी, साहिब सेती२ ह्वै सबै ॥७॥ 
उस प्रभु ने विश्व और शरीर रूप दोनों ही महल बिना ही मसाले इच्छा मात्र बनाये हैं, इससे ही हमने उस समर्थ की शक्ति१ जान ली है, उस प्रभु से२ सभी कुछ हो सकता है । 
काया सौं छाया भयी, पर काया का क्या अंस । 
तैसे रज्जब देखिये, पार ब्रह्म सौ हंस ॥८॥ 
शरीर से ही छाया होती है किन्तु उस छाया में शरीर का क्या अंश है ? अर्थात कुछ नहीं है, वैसे ही परब्रह्म से जीवात्मा होता है ।
(क्रमशः)

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