शुक्रवार, 30 नवंबर 2018

= पारिख का अँग(२७ - १६/१८) =


#daduji 
卐 सत्यराम सा 卐 
*श्री दादू अनुभव वाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
*पारिख का अँग २७* 
सब जीव प्राणी भूत हैं, साधु मिले तब देव ।
ब्रह्म मिले तब ब्रह्म हैं, दादू अलख अभेव ॥१६॥
सभी प्राणधारी अज्ञानी जीव भूतों के समान नीच प्रवृत्ति वाले होने से भूत समान ही हैं । सँत मिलने पर दैवी गुण प्राप्ति द्वारा देव समान हो जाते हैं और ब्रह्म - ज्ञान द्वारा ब्रह्म प्राप्त होने पर तो मन - इन्द्रियों के अविषय भेदरहित ब्रह्म रूप ही हो जाते हैं ।
करतूति=कर्म
दादू बंध्या जीव है, छूटा ब्रह्म समान ।
दादू दोनों देखिये, दूजा नाहीं आन ॥१७॥
१७ - १८ में जीव ब्रह्म का लक्षण कर रहे हैं, जो कर्म पाश में बंधा है, वही जीव है और जो कर्मों से मुक्त है, वही ब्रह्म है । जीव और ब्रह्म के भेद में कर्म का होना, न होना, ही हेतु देखा जाता है, अन्य दूसरा हेतु कोई भी नहीं है ।
कर्मों के बस जीव है, कर्म रहित सो ब्रह्म ।
जहं आतम तहं परमात्मा, दादू भागा भर्म ॥१८॥
जीव कर्मों के वश में है और ब्रह्म कर्म रहित है । जब ब्रह्मनिष्ठ गुरु के ज्ञानोपदेश से अज्ञान नष्ट हो जाता है तब, जहां आत्मा का साक्षात्कार होता है, वहां ही ब्रह्म का साक्षात्कार होता है अर्थात् दोनों एकरूप ही भासते हैं । 
(क्रमशः)

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