#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ ।*
*घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*समर्थता का अंग ५१*
इस अंग में इश्वर की शक्ति का विचार कर रहे हैं ~
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सूरज रूपी सांईयां, साधू सूरज कांति१ ।
उभय अकर्ता करैं भी, जन रज्जब बिन तांति२ ॥१॥
परमात्मा सूर्य रूप हैं और संत सूर्य की किरण रूप हैं, जैसे सूर्य और उसकी किरण१ दोनों प्रकाश करते भी हैं किन्तु उनके प्रकाश में जो कुछ किया जाता है उसका फल उन्हें नहीं मिलता, वैसे ही परमात्मा और ज्ञानी संत आसक्ति डोरी२ में न बँधकर करते हैं, अत: अकर्ता ही हैं, उन्हें कर्म का फल नहीं मिलता, उनमें कर्तापन की भावना नहीं रहती ।
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बावन बदले वनीय१ वपु२, नरपति छांह हुमाय ।
रज्जब कृत्रिम३ कलायें भांसे, यूं अकर करै गति लखी न जाय ॥२॥
वामन चन्दन वन१ के वृक्षों के शरीर२ को बदल देता है, हुमा पक्षी की छाया नर को नरपति रूप में बदल देती है किन्तु वामन चन्दन तथा हुमा की छाया में कर्तापन की भावना नहीं होती, मायाकृत३ पदार्थो में भी जब ये कलायें है तब परमात्मा करता हुआ अकर्ता हो इसमें कहना ही क्या है ? उसका स्वरूप मन इन्द्रियों द्वारा नहीं देखा जाता फिर उसकी शक्ति का क्या पता लग सकता है ?
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शशि मंडल सूरज परे१, पोषे भार अठार ।
कृत्रिम२ कन ऐसी कला३, कर्ता घटि४ न विचार ॥३॥
चन्द्र मंडल तथा सूर्य मंडल दूर१ रहते हुये भी अठारह भार वनस्पति का सर्दी गरमी द्वारा पोषण करते हैं जब भगवान के बनाये२ हुयों में भी ऐसी शक्ति३ है तब विचारो, सृष्टिकर्त्ता प्रभु में कम४ नहीं हो सकती ।
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स्त्रिक१ सविता२ सु अलाहिदे, पलटे अदभू३ आंख ।
रज्जब नर नरपति भये, छाँह हुमाई पांख ॥४॥
चन्दन१ वृक्षों२ को बदलकर, सूर्य आँखों को बदलकर और हुमा पक्षी की छाया नर को नरपतिरूप में बदलकर भी उनसे अलग ही रहते हैं वैसे ही सृष्टिकर्ता ईश्वर सृष्टि रचना करके भी उनसे अलग रहते हैं ।
(क्रमशः)

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