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卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*पारिख का अँग २७*
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काया के वश जीव सब, ह्वै गये अनँत अपार ।
दादू काया वश करे, निरंजन निराकार ॥१३॥
शारीरिक कामादि गुणों के वश होकर सभी जीव अनन्त बार जन्म कर अनन्त बार ही काल के मुख में गये हैं किन्तु जो सँत शारीरिक कामादि गुणों को अपने वश करते हैं, वे निरंजन निराकार परब्रह्म को प्राप्त होते हैं ।
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पूरण ब्रह्म विचारिये, तब सकल आतमा एक ।
काया के गुण देखिये, तो नाना वरण१ अनेक ॥१४॥
यदि व्यापक ब्रह्म का विचार करें, तब तो आत्मा ब्रह्म रूप होने से सभी एक हैं और शरीर के गुण, दोष, रँग१ आकृततियों को देखें तो नाना गुण, दोष, रँग और अनेक जातियां१ व आकृतियां दृष्टि में आती हैं । सँत ब्रह्म विचार द्वारा सब आत्माओं को एक रूप से देखते हैं और सँसारी जन शरीर के गुण, दोष, रँग१ आकृतियों को देखते हैं । यही सँतों व असँतों में विपरीतता है ।
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नर विड१ रूप
(मति) बुद्धि विवेक विचार बिन, माणस पशू समान ।
समझाया समझे नहीं, दादू परम गियान ॥१५॥
१५ - १६ में नर की तुच्छ१ रूपता दिखा रहे हैं, धर्म बुद्धि, आत्मानात्मा विवेक, और ब्रह्म विचार के बिना मनुष्य पशु तुल्य ही है, इसीलिए श्रेष्ठ ज्ञान समझाने पर भी नहीं समझता ।
(क्रमशः)

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