मंगलवार, 27 नवंबर 2018

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🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*दादू साधु संगति पाइये, राम अमीफल होइ ।*
*संसारी संगति पाइये, विषफल देवै सोइ ॥*
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साभार ~ Gyan Aur Bhakti

विद्या में विनय, विभूति और विराट समाहित है। अल्पता से अनंतता और सह-अस्तित्व का बोध विद्या की फल-श्रुति है..! आदि काल से ही हमारी भारतीय संस्कृति में विद्या का बड़ा महत्व रहा है। शिक्षा को अमरत्व का साधन माना गया है। "सा विद्या या विमुक्तेय ..." का मंत्र एक मात्र भारतीय संस्कृति में ही मिलता है। और, इसी तरह से हमारी संस्कृति ने सनातन काल से गुरु शिष्य परंपरा के माध्यम से शिक्षा को जीवन का एक महत्वपूर्ण अंग माना है। एक-एक क्षण गवाए बिना विद्या प्राप्त करनी चाहिए। 
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विद्या विनय देती है; विनय से पात्रता, पात्रता से अर्थ(धन), अर्थ से धर्म और धर्म से मोक्ष की प्राप्ति होती है। विद्या अनुपम कीर्ति है; भाग्य का नाश होने पर भी यह आश्रय देती है। विद्या कामधेनु है, विरह में रति समान है, विद्या तीसरा नेत्र है, सत्कार का मंदिर है, कुल-महिमा है, विद्या बिना रत्न का आभूषण है। इसलिए अन्य सब विषयों को छोड़ कर विद्या का अधिकारी बनें। माँ सरस्वती का ये खजाना सचमुच अनमोल है, अवर्णनीय है। खर्च करने से ये बढ़ता है। और, संभालने से ये कम होता है। अतः विद्या जैसा कोई बंधु नहीं, विद्या जैसा कोई मित्र नहीं और विद्या जैसा अन्य कोई धन या सुख नहीं...।
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त्याग की भावना अत्यंत पवित्र है। त्याग करने वाले पुरुषों ने ही संसार को प्रकाशमान किया है। जिसने भी जीवन में त्यागने की भावना को अंगीकार किया, उसने ही उच्च से उच्च मानदंड स्थापित किए हैं। सच्चा सुख व शांति त्यागने में है, न कि किसी तरह कुछ हासिल करने में। गीता ने संन्यास शब्द के जगह त्याग शब्द का प्रयोग किया है। 
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त्याग का सात्विक अर्थ है - व्यक्तिगत स्वार्थ तथा अहं तत्व से पीछे हटना। ईश्वर की अनुभूति करने और समाज में उच्च मानदंड स्थापित करने के लिए त्याग की भावना को अंगीकार कर, उस पथ पर बढ़ने की आवश्यकता होती है। उस मार्ग में व्यक्तिगत व शारीरिक सुखों का त्याग करना होगा। उन सभी आसक्तिओं को छोड़ना होगा, जो मानव जीवन को संकीर्णता की ओर ले जाने वाली होती है। तब यही त्याग वृत्ति अंत:करण को पवित्र कर भीतर के तेज को देदीप्यमान करती है। 
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भारत में त्याग की परंपरा पुरातनकाल से चली आ रही है। आसक्ति से विरत हो जाने वालों की यहां पूजा की जाती है। भगवान श्रीराम द्वारा अयोध्या के राज्य को एक क्षण में त्याग देने जैसे स्थापित किए गए आदर्श को संसार पूजता है। राज्य का त्याग कर वन में जाने से उन्होंने समाज में उच्चतम मानदंड स्थापित किया। साथ ही लोगों को धर्म, अध्यात्म, ज्ञान व भक्ति के मार्ग की ओर अग्रसर होने की प्रेरणा भी प्रदान की। त्याग से मनुष्य ईश्वर को प्राप्त कर सच्चे सुख व शांति का लाभ पाता है, वहीं समाज को भी उच्च आदर्शों के मानदंड को बनाये रखने की प्रेरणा प्रदान करता है...।

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