#daduji
॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
.
(६)
*कैसैं राम मिलै मोहि संतो यह मन थिर न रहाई रे ।*
*निहचल निमष होत नहि कबहौं चहुं दिशि भागा जाई रे ॥टेक॥*
हे सन्तजन ! मुझे राम के दर्शन कैसे हो सकते हैं, जबकि मेरा चित्त ही स्थिर नहीं है । यह क्षणमात्र के लिये भी स्थिर नहीं होता, यह तो दिन रात चारों दिशाओं में(इधर उधर) दौड़ता रहता है ॥टेक॥
*कौंन उपाय करौं या मन कौ कैसी बिधि अटकाऊं रे ।*
*ऐसैं छूटि जाइ या तन सैं कतहूं षोज न पाऊं रे ॥१॥*
इसकी स्थिरता के लिये मैं क्या उपाय करूँ कि यह कहीं किसी को आधार मानकर वहाँ स्थिर हो जाय । यह तो मेरे शरीर से ऐसा निकल भागता है कि मैं इसे कहीं खोज ही नहीं पाता ॥१॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें