#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*दादू पड़दा भ्रम का, रह्या सकल घट छाइ ।*
*गुरु गोविन्द कृपा करैं, तो सहजैं ही मिट जाइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*समर्थता का अंग ५१*
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ज्यों दिनकर१ शशि२ दीप करे, सकल सृष्टि आधार ।
तैसे रज्जब राम बिन, तन मन धोर अंधार ॥३३॥
जैसे सूर्य१ चन्द्रमा२ और दीपक -प्रकाश के आश्रय सब सृष्टि के प्राणियों का कार्य चलता है, उक्त तीनों के बिना अंधेरा रहता है, वैसे ही राम के ज्ञान - प्रकाश बिना तन मन में अज्ञान रूप धोर अंधकार भरा रहता है ।
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रज्जब गुडी१ अनन्त के, एक पवन आधार ।
त्यों तन मन आतम राम बल, हिले चले संसार ॥३४॥
जैसे आकाश में अनन्त पतंग१ एक वायु के आधार उड़ते हैं, वैसे ही तन मन जीवात्मा आदि सकल संसार एक राम के बल से ही हिलता चलता है ।
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ज्यों जल के बल मीन सब, मगन मुदित ता१ माँहिं ।
तैसे रज्जब प्राण पति, न्यारे जीवें नाँहिं ॥३५॥
जैसे सब मच्छियां जल के बल से जल१ में निमग्न रहकर प्रसन्न रहती हैं, जल के बाहर जीवित नहीं रह सकतीं, वैसे ही प्राणपति प्रभु की रक्षा में ही संपूर्ण प्राणी प्रसन्न रहते हैं, प्रभु से अलग होकर जीवित नहीं रह सकते ।
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परमतत्त्व प्राण में बैठ्या, पंचों तत्त्व चलावे ।
असमझहिं अगम सुगम समझे को, गुरु प्रसाद सौं पावे ॥३६॥
वह परमतत्त्व रूप ब्रह्म साक्षी रूप से प्राणी में स्थित है, ईश्वर रूप से पांचों तत्त्वों का संचालन करता है, गुरु कृपा द्वारा समझे हुए के लिये उसका स्वरूप जानना सुगम है और अज्ञानियों के लिये अगम है ।
(क्रमशः)

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