🌷🙏🇮🇳 #daduji 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
*जात कत मद को मातो रे ।*
*तन धन जोबन देख गर्वानो, माया रातो रे ॥*
*मैं मैं करत जन्म सब खोयो, काल सिरहाणे आयो रे ।*
*दादू देख मूढ़ नर प्राणी, हरि बिन जन्म गँवायो रे ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. १३५)
===============================
साभार ~ @Amit Thacker
तुलसीदास के जीवन में कथा है कि पत्नी मायके गई थी। तो वर्षा की रात में सांप को पकड़ कर वे चढ़ गए। घर के पीछे से प्रवेश कर रहे थे चोर की भांति। बड़ी गहरी मूढ़ता रही होगी कि सांप भी दिखाई न पड़ा, रस्सी समझ में आया। वासना बड़ी तीव्र रही होगी; कामना ने बिलकुल अंधा कर दिया होगा; आंखें बिलकुल अंधेरे से भर गई होंगी। नहीं तो सांप दिखाई न पड़े !
.
हालत तो ऐसी है कि अक्सर रस्सी में सांप दिखाई पड़ जाता है--भय के कारण। मौत आदमी को डराती है। राह पर रस्सी पड़ी हो तो सांप दिख जाता है। इससे उलटी हालत हुई--सांप था और तुलसीदास ने समझा कि रस्सी है और चढ़ गए ! पकड़ा, तब भी स्पर्श से पता न चला। बिलकुल मूर्च्छित रहे होंगे ! कामवासना ने पागल कर दिया होगा !
.
पत्नी ने कहा देख कर यह दशा कि जितना प्रेम मुझसे है, अगर इतना ही प्रेम परमात्मा से होता, तो तुम अब तक महापद के अधिकारी हो जाते। पीछे लौट कर सांप को देखा--खयाल आया, वासना अंधा बना देती है--जीवन में एक क्रांति घटित हो गई। पत्नी गुरु बन गई। वासना ने निर्वासना की तरफ जगा दिया। संन्यस्त जीवन हो गया। परमात्मा को खोजने लगे। काम में जो शक्ति लगी थी, वह राम की तलाश करने लगी। जो ऊर्जा काम बनती थी, वही ऊर्जा राम बनने लगी।
.
मूढ़ता ही वही ऊर्जा है। जो आज सोई-सोई है, वही कल जागेगी; जो आज छिपी पड़ी है, वही कल प्रकट होगी। मूढ़ता ही प्रज्ञा बनेगी। वह जो तुम्हारी नींद है, वही तुम्हारा जागरण बनेगी। इसलिए उससे नाराज मत होना; और न ही मन में निंदा से भरना; और न ही अपनी मूढ़ता को छिपाने की कोशिश करना।
.
बहुत लोग वही कर रहे हैं ! वे महामूढ़ हैं, जो मूढ़ता को छिपाने की कोशिश कर रहे हैं। तो तुम छोटी-मोटी जानकारी इकट्ठी कर लेते हो; अपनी मूढ़ता को जानकारी से ढांक लेते हो। भीतर घाव रहते हैं, ऊपर से तुम फूल लगा लेते हो। शास्त्र से उधार लिया ज्ञान ऐसे ही फूल हैं, दूसरों से उधार ली जानकारी ऐसे ही फूल हैं, जिनमें तुम ढांक लेते हो मूढ़ता को और भूल जाते हो।
.
मूढ़ता को भूलना नहीं है, मूढ़ता को याद रखना है। क्योंकि याद रखो तो ही उसे मिटाया जा सकता है; भूल गए तो मिटाना असंभव है। इसलिए शंकर पद-पद पर दोहराते हैं:
भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम्, भज गोविन्दम् मूढ़मते।
तुम्हारी बेहोशी को देख कर करुणावश दोहराते हैं। तुम्हें याद रहे कि तुम मूढ़ हो, यह कहीं भूल न जाए। और तुम्हारी पूरी चेष्टा है कि भूल जाए। तुम पूरे उपाय करते हो कि किसी तरह यह बात भूल जाए कि मैं मूढ़ हूं ! तुम मान कर चलते हो कि मैं ज्ञानी हूं।
.
सिर्फ ज्ञानी ही मानते हैं कि वे ज्ञानी नहीं हैं, अज्ञानी तो सभी मानते हैं कि वे ज्ञानी हैं। अज्ञानी तो बड़ी अकड़ से संघर्ष करता है अपने ज्ञान का। वह तो मानने को राजी नहीं होता है कि मैं नहीं जानता हूं। सिर्फ परम ज्ञानी ही मानने को राजी होते हैं कि क्या हम जानते हैं !
.
एडीसन ने कहा है कि लोग कहते हैं कि मैं बहुत जानता हूं। और मेरी हालत ऐसी है, जैसे एक छोटे बच्चे ने सागर के किनारे कुछ शंख और सीप इकट्ठे कर लिए हों। इतना ही मेरा ज्ञान है--मुट्ठियों में थोड़े से शंख-सीप। और विराट सागर पड़ा है जिसको मैं जानता नहीं हूं।
.
तुम्हें अपना छोटा सा ज्ञान बहुत बड़ा मालूम पड़ता है ! एक छोटा सा दीया जला लिया है, उसकी टिमटिमाती रोशनी पड़ती है चारों तरफ, थोड़ी सी जगह रोशन हो जाती है, इसको तुम ज्ञान कहते हो ! और अनंत पड़ा है अंधकार से भरा, उसका तुम्हें कोई होश नहीं है ! जब तुम समझोगे अपनी मूढ़ता को तो तुम कहोगे, यह भी कोई ज्ञान है--यह टिमटिमाती दीये की रोशनी !
.
अनंत पड़ा है यात्रा के लिए, अनंत पड़ा है अन्वेषण के लिए, अनंत पड़ा है खोजने के लिए--और मैं इन शंख-सीपियों को हाथ में बटोर कर ज्ञानी हो रहा हूं ! तब तुम इस ज्ञान को भी छोड़ दोगे। और जिस दिन तुम जानोगे कि तुम मूढ़ हो--इस होश से भरोगे--उसी दिन मूढ़ता पिघलने लगी। क्योंकि यह होश मूढ़ता के बाहर ले जाएगा। मूढ़ता बेहोशी है, तो होश के साथ टूटने लगेगी।
भज गोंविंदम मुढ़मते -- प्रवचन -- ४

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें