#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*समर्थ सो सेरी समझाइनैं, कर अणकर्ता होइ ।*
*घट घट व्यापक पूर सब, रहै निरंतर सोइ ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*समर्थता का अंग ५१*
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आदि किया सो भी भया, मध्य करे सो होय ।
अंत करे सो होयगा, रज्जब समर्थ सोय ॥३७॥
उस समर्थ प्रभु ने आदि में जो कुछ किया था वह हो गया है, मध्य में जो किया है वह भी हो रहा है और अंत में जो भी करेंगे वह भी होगा, कारण वह सर्व समर्थ हैं ।
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रज्जब रच्या सो ना भया, राम रचैं सो होय ।
यूं अविगत पहचानिये, करता औरहि कोय ॥३८॥
जीव ने रचा वह कार्य तो सिद्ध नहीं हुआ और राम रचते हैं वह होकर ही रहता है, अत: सृष्टिकर्त्ता जीव से कोई भिन्न ही है, उस प्रभु को उक्त प्रकार की अद्भुत शक्ति द्वारा ही पहचानो ।
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सांई समर्थ सब करैं, श्याम श्वेत सब होय ।
जन रज्जब दृष्टांत को, वृद्ध बाल ले जोय ॥३९॥
वे समर्थ प्रभु सब कुछ करते हैं, उनके द्वारा ही श्याम केश श्वेत होते हैं, दृष्टान्त के लिये बालक और वृद्ध को देखो, बालक के केश काले होते हैं, वह जब वृद्ध होता है तो काले केश भी श्वेत हो जाते हैं, अत: उन प्रभु की शक्ति अद्भुत और आपार है ।
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इति श्री रज्जब गिरार्थ प्रकाशिका सहित समर्थता का अंग ५१ समाप्त । सा. १७७४ ॥
(क्रमशः)

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