गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

= सुन्दर पदावली(१२. राग बिलावल(कायाबेली ग्रंथ ११) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
(११) 
*ऐसा सतगुरु कीजिये करनी का पूरा ।* 
*उनमनि ध्यांन तहां धरै जहां चन्द न सूरा ॥टेक॥* 
ऐसे सद्गुरु बनाना चाहिये जो भगवत्प्राप्ति का स्वयं कृतकृत्य हो चुके हों । जो समाधि की उन्मनी अवस्था में निरन्तर साधनारत रहें । जहाँ चन्द्रमा एवं सूर्य को भी गति न हो ॥टेक॥ 
*तन मन इंद्री बसि करै फिरि उलटि समावै ।* 
*कनक कामिनी देषि कैं कहुं चित्त न चलावै ॥१॥* 
जो साधक जितेन्द्रिय हो चुका हो, निरन्तर समाधि साधना में निरत रहता हो । किसी अन्य की सांसारिक सम्पति या नारी की ओर जिसका चित्त कभी न जाता हो ॥१॥ 
*द्वै पष हिंदू तुरक की बिचि आप संभालै ।* 
*ज्ञान षडग गहि झूझता मधि मारग चालै ॥२॥* 
हिन्दु एवं तुर्क - दोनों के सिद्धान्तों का समन्वय करते हए, स्वशास्त्रीय ज्ञान के आधार पर, समझ-बूझ कर मध्यम मार्ग को स्वीकार करे ॥२॥ 
*जानै सबकौं एक ही पांनी की बूंदा ।* 
*नीच ऊंच देषै नहीं कोई बाभण सूदा ॥३॥* 
समस्त मानव जाति को एक ही जल का बिन्दु(एक ईश्वर की सन्तान) समझते हुए, किसी को भी ऊँच या नीच न समझते हुए, ब्राह्मण से शूद्र तक सभी को एक मानव जाति का सदस्य समझे ॥३॥ 
*सब संतनि का मत गहै सुमिरै करतारा ।* 
*सुन्दर ऐसै गुरु बिना नहिं ह्वै निस्तारा ॥४॥* 
हमारे कथन का निष्कर्ष यह है कि सभी ईश्वर भजनी सन्तों के मतों में प्राणिमात्र समान हैं(उनमें जाति, वर्ग एवं कुल का कोई भेद नहीं है) महाराज श्री सुन्दरदासजी कहते हैं - ऐसे ईशवरभक्त गुरु की प्राप्ति के बिना किसी प्राणी का उद्धार नहीं हो सकता ॥४॥ 
(क्रमशः)

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