शुक्रवार, 7 दिसंबर 2018

= समर्थता का अंग ५१(२९/३२) =

#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*पैदा किया घाट घड़, आपै आप उपाइ ।*
*हिकमत हुनर कारीगरी, दादू लखी न जाइ ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*समर्थता का अंग ५१*
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अंड सौं पंखी ऊपजे, पुनी पंखी मधि अंड । 
ब्रह्म बुद्धि वेत्ता विथक१, क्यों जोड़े जिव पिंड ॥२९॥ 
अंडे से पक्षी उत्पन्न होता है और पुन: पक्षी से अंडा उत्पन्न होता है, ब्रह्म की बुद्धि को देखकर ज्ञानी जन भी चकित१ होता है कि - जीव व शरीर को कैसे जोड़ते हैं । 
पाणी माँहिं अग्नि राखिये, अग्नि मध्य सो पानी । 
रज्जब रचना अगह१ की, वारि२ बीजुरी३ सानी ॥३०॥ 
समुद्र के जल से बड़वानल अग्नि को रखते हैं और उस अग्नि की गरमी से ही वह जल वर्षता है, मन आदि से अग्राह्य१ ब्रह्म की रचना विचित्र ही है, देखो जल२ और बिजली३ को मिलाकर रखते हैं । 
श्रावण मास करै ऊन्हालो, ऊन्हाले वर्षालो । 
रज्जब कहै सुनो रे जीवो, अकरन करन संभालो ॥३१॥ 
जो वर्षा ऋतु के श्रावण मास में तो ग्रीष्म ऋतु और ग्रीष्म ऋतु में वर्षा ऋतु कर देते हैं, हे जीवों ! उस न करने वाले काम को भी करने वाले प्रभु का स्मरण करो । 
पाणी मैं तें पावक निकसे, पावक मैं तें पाणी । 
रज्जब रचना अगह१ गति२, काहू जाय न जाणी ॥३२॥ 
जल में से बिजली रूप अग्नि निकलता है, और गरमी पड़ने से ही पानी वर्षता है, इन्द्रियों से अग्राह्य१ प्रभू की रचना रूप लीला२ किसी से भी जानी नहीं जाती । 
(क्रमशः)

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