सोमवार, 10 दिसंबर 2018

= सुन्दर पदावली(१२. राग बिलावल(कायाबेली ग्रंथ १५) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
(१५) 
*जाकै हिरदै ज्ञान है ताहि कर्म न लागै ।* 
*सब परि बैठै मक्षका पावक तैं भागै ॥टेक॥* 
ज्ञानी को कर्मफल नहीं लगता । यह बात तो वैसी ही है, जैसे सब स्थानों पर बैठने वाली मक्षिका अग्नि पर बैठने का साहस नहीं करती । उससे दूर ही रहती है ॥टेक॥ 
*जहां पाहरू जागहीं तहां चोर न जांहीं ।* 
*आंषिन देषत सिंह कौं पशु दूरि पलांहीं ॥१॥* 
जहाँ पहरेदार(रक्षक) पहरा देता रहता है, चोर वहाँ जाने का साहस नहीं करता । जैसे वन में सिंह को नेत्रों से देखते ही कोई पशु दूर भाग जाता है ॥१॥ 
*जा घर मांहिं मंजार ह्वै तहां मूषक नासै ।* 
*शब्द सुनत ही मोर का अहि रहै न पासै ॥२॥* 
जैसे किसी घर में कोई चूहा, बिल्ली को देखते ही, दूर भाग जाता है, तथा कोई सर्प मयूर का शब्द सुनते ही वहाँ से दूर भागने का प्रयास करता है; किसी भी स्थिति में वह समीप नहीं दिखायी देता ॥२॥ 
*ज्यौं रवि निकट न देषिये कब हूं अंधियारा ।* 
*सुन्दर सदा प्रकास मैं सब ही तैं न्यारा ॥३॥* 
जैसे सूर्य के उदित होते ही अन्धकार विलुप्त हो जाता है, उसी तरह यह चेतन भी अचेतन से दूर ही रहता है ॥३॥ 
(क्रमशः)

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