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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
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(१५)
*जाकै हिरदै ज्ञान है ताहि कर्म न लागै ।*
*सब परि बैठै मक्षका पावक तैं भागै ॥टेक॥*
ज्ञानी को कर्मफल नहीं लगता । यह बात तो वैसी ही है, जैसे सब स्थानों पर बैठने वाली मक्षिका अग्नि पर बैठने का साहस नहीं करती । उससे दूर ही रहती है ॥टेक॥
*जहां पाहरू जागहीं तहां चोर न जांहीं ।*
*आंषिन देषत सिंह कौं पशु दूरि पलांहीं ॥१॥*
जहाँ पहरेदार(रक्षक) पहरा देता रहता है, चोर वहाँ जाने का साहस नहीं करता । जैसे वन में सिंह को नेत्रों से देखते ही कोई पशु दूर भाग जाता है ॥१॥
*जा घर मांहिं मंजार ह्वै तहां मूषक नासै ।*
*शब्द सुनत ही मोर का अहि रहै न पासै ॥२॥*
जैसे किसी घर में कोई चूहा, बिल्ली को देखते ही, दूर भाग जाता है, तथा कोई सर्प मयूर का शब्द सुनते ही वहाँ से दूर भागने का प्रयास करता है; किसी भी स्थिति में वह समीप नहीं दिखायी देता ॥२॥
*ज्यौं रवि निकट न देषिये कब हूं अंधियारा ।*
*सुन्दर सदा प्रकास मैं सब ही तैं न्यारा ॥३॥*
जैसे सूर्य के उदित होते ही अन्धकार विलुप्त हो जाता है, उसी तरह यह चेतन भी अचेतन से दूर ही रहता है ॥३॥
(क्रमशः)

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