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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
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*तन मन नाहीं, मैं नहीं, नहीं माया, नहीं जीव ।*
*दादू एकै देखिए, दहदिसि मेरा पीव ॥*
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साभार ~ Gyan Aur Bhakti
निर्मलता के अभाव के कारण ही मनुष्य स्वयं को जान नहीं पा रहा है। जन्म से बालक में जो गुण और संस्कार पाये जाते हैं वे अधिकाँश उसके पिता के गुणों और संस्कारों की प्रतिच्छाया ही होते हैं। बीज और फल में शक्ति, गुण और स्वाद की विशेषतायें प्रायः एक जैसी ही होती हैं। मीठे फल के बीज से उत्पन्न वृक्ष भी मीठे फल ही प्रदान करने वाले होते हैं।
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वातावरण, जलवायु तथा वैज्ञानिकों और डॉक्टरों का मत है कि सन्तान के शरीर के न केवल सूक्ष्म गुणों में ही समानता पाई जाती है वरन् स्थूल द्रव्य में भी एकता के सभी लक्षण दिखाई दे जाते हैं।
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रामायण कहती है - ईश्वर अंश जीव अविनाशी, चेतन अमल सहज सुख राशि।। यानि, ईश्वर के अंश होने के कारण हम परम आनंद को पाने के अधिकारी हैं, चेतना के उस दिव्य स्तर तक पहुंचने के अधिकारी हैं जहाँ विशुद्ध प्रेम, सुख, ज्ञान, शक्ति, पवित्रता और शांति है। सम्पूर्ण प्रकृति भी तब हमारे लिये सुखदायी हो जाती है।
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इस स्थिति को केवल अनुभव किया जा सकता है, क्योंकि यह स्थूल नहीं है, अति सूक्ष्म है। परम की अनुभूति अंतर को अनंत सुख से ओतप्रोत कर देती है। और, परम तक ले जाने वाला कोई सदगुरु ही हो सकता है। सर्व भाव से उस सच्चिदानंद की शरण में जाने की विधि वही सिखाते हैं। हम देह नहीं हैं, देही हैं, जिसे शास्त्रों में जीव कहते हैं। जीव परमात्मा का अंश है, उसके लक्षण भी वही हैं जो परमात्मा के हैं। वह भी शाश्वत, चेतन तथा आनन्दस्वरूप है...।

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