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🌷🙏🇮🇳 卐 सत्यराम सा 卐 🇮🇳🙏🌷
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*हार जीत सौं हरि रस जाई,*
*समझि देख मेरे मन भाई !*
*मूल न छाड़ी दादू बौरे,*
*जनि भूलै तूँ बकबे औरे ॥*
(श्री दादूवाणी ~ पद. २७९)
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साभार ~ Gyan Aur Bhakti
जैसे ही अन्त:करण में शुभ-संकल्पता, सकारात्मकता और विधेयक भाव संपन्नता उदित होती है; उसी समय हमें संपूर्ण सृष्टि में सौन्दर्य, माधुर्य और अपनत्व अनुभूत होने लगेगा। अतः जीवन को आध्यात्मिक बनायें...!
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सकारात्मक सोच ही है जो बदल सकती है आपकी दुनिया और जीने का अंदाज़ भी। जो दे आपको जीने के लिए आशा की किरण और दिलाए सफलता प्राप्त करने का अचूक विश्वास। नकारात्मकता को दूर करने के लिए नित नूतन विचारों को पढ़ें, उनका प्रयोग करें।
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हम महापुरुषों की, वैज्ञानिकों की, विचारकों की आत्मकथाएं पढ़ सकते हैं। उनकी गौरव गाथाएं पढ़ें जिससे आप नैतिक रूप से मजबूत हो सकें। उनकी आत्म कथाओं से पता लगेगा कि उन्होंने चुनौतियां किस रूप में स्वीकारी, कठिनाइयों को किस तरह से सरल किया। सकारात्मकता का मतलब है - आप बहुत आशावादी हैं। आशावादिता का अर्थ यह है कि आप में निराशा नहीं है।
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सकारात्मकता तीन चीजें साथ लेकर चलती हैं। पहली - नव सृजन यानी नूतनता या अभिनवता। आपको हर चीज नई करनी है। दूसरी चीज है - पुरातन। इससे आपको सीखना है। पुरातन यानी भूतकाल आपका शिक्षक बने और भविष्य के प्रति आप आशावादिता रखें। अब तीसरी चीज है - वर्तमान। वर्तमान में यदि कहीं कठिनाई, दुविधा है या कोई चुनौती अनुभव कर रहे हैं तो इसका अर्थ है कि वो चुनौती आपकी सक्षमता को जगाने के लिए है। आप और अधिक योग्य बनें, श्रमवान बनें अथवा अपने सामर्थ्य को जगाएं।
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जिनमें हम देखते हैं कि सकारात्मकता खो गई है तो इसका अर्थ यह हुआ कि वे वर्तमान की प्रति सजग नहीं हैं और भविष्य के प्रति आशावादी नहीं हैं। आशावादिता एक चीज साथ लेकर चलती है जिसका नाम है - आत्मविश्वास। सकारात्मक व्यक्ति वही है जो अपने आत्मविश्वास को संभालकर रखता है। और, आत्मविश्वासी व्यक्ति ही सफलता की ओर बढ़ता है। आत्मविश्वास सफलता की कुंजी है। इसलिए सफलता वहां है जहां स्वयं के प्रति विश्वास है और इसका मूल है - सकारात्मकता...।

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