मंगलवार, 4 दिसंबर 2018

= समर्थता का अंग ५१(१७/२०) =

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*दादू खालिक खेलै खेल कर, बूझै बिरला कोइ ।*
*लेकर सुखिया ना भया, देकर सुखिया होइ ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*समर्थता का अंग ५१*
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नर नारायण में रहै, सदा सुकाल दुकाल । 
कब हीं सृष्टि उपाव हीं, कब हूं सब के काल ॥१७॥ 
नर तथा नारायण दोनों में ही सदा सुकाल और दुष्काल रहता है, जैसे नर मनोराज्य रूप सृष्टि उत्पन्न करता है और नष्ट करता है, वैसे ही नारायण कभी तो सृष्टि उत्पन्न करते हैं और कभी नष्ट कर देते हैं । 
रज्जब राम रसायणी, सेवक सरवस१ लेय । 
पै श्री२ सिरज संहारिनी, विद्या किस हि न देय ॥१८॥ 
राम रसायन वाले पुरुष के समान हैं, वह अपना सब धन१ तो दे देता है किन्तु धन को उत्पन्न करने की रसायन विद्या नहीं देता, वैसे ही राम भक्त को अपना सर्वस्व दे देते हैं किन्तु सृष्टि उत्पन्न करने की तथा नाश करने की शक्ति२ किसी को भी नहीं देते हैं । 
जन रज्जब जामण मरण, घर घर आथि१ अनाथि२ । 
आदम३ को सौंपी न ये, राखी अपणे हाथि ॥१९॥ 
प्रति घर की जन्म-मरण रूप पूंजी का जमा१ - खर्च२ भगवान् ने मनुष्य३ को नहीं सौंपा है, अपने हाथ में ही रखा है अर्थात उक्त शक्ति प्रभु में ही है, मनुष्य में नहीं आ सकती । 
पंच तत्त्व में वाहि१ कर, बांधे आतम राम । 
रज्जब दिया न और को, घट२ घड़ने का काम ॥२०॥ 
राम ने पांच तत्त्वों का शरीर बना के उसमें आत्मा को डाल१ कर बांध दिया है, यह शरीर२ बनाने का किसी अन्य को न देकर अपने हाथ में ही रखा है ।
(क्रमशः)

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