सोमवार, 3 दिसंबर 2018

= सुन्दर पदावली(१२. राग बिलावल(कायाबेली ग्रंथ ९/२) =

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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥ 
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली* 
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी, 
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान) 
*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
(९) 
*इडा पिंगला सम करि राषै, सुषमन करै गगन दिशि गौंना ।* 
*अह निश ब्रह्म अग्नि परजारै, सापनि द्वार छाडि दे जौंना ॥२॥* 
इडा, पिंगला नाडियों को सम स्थिति में रखने का अभ्यास करे । सुषुम्ना को शून्य स्थिति में रखने का अभ्यास करे । योगाग्नि को निरन्तर प्रज्वलित रखे । कुण्डलिनी को मूलाधार चक्र पर रोके ॥२॥ 
*बहुदल षटदल दशदल षोजै, द्वादशदल तहां अनहद भौंना ।* 
*षोडशदल अंमृतरस पीवै, ऊपरि द्वै दल करै चतौंना ॥३॥* 
इसी अभ्यास में षट्चक्र एवं दशचक्र तथा द्वादशचक्र, जहाँ निरन्तर अनहदनाद होता रहता है; होकर षोडश(सोलहवें) चक्र तक पहुँच कर वहाँ अमृतरस का पान करे ॥३॥ 
*चढि आकास अमर पद पावै, ताकौं काल कदे नहिं षौंना ।* 
*सुन्दरदास कहै सुनु अबधू, महा कठिन यह पंथ अलैंना ॥४॥* 
इस प्रकार, योगाभ्यास द्वारा शून्य स्थिति में अमृत पान करना ही योगी का परम लक्ष्य होता है । इस स्थिति में पहुँचने पर योगी को मृत्यु का कोई भय नहीं रहता । महाराज श्री सुन्दरदास जी कहते हैं - ऐसे किसी योगसाधक सिद्ध अवधूत को कठिन साधना करने पर ही यह पद(स्थान) मिल पाता है ॥४॥
(क्रमशः)

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