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*दादू आपा उरझे उरझिया, दीसे सब संसार ।*
*आपा सुरझे सुरझिया, यह गुरु ज्ञान विचार ॥*
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साभार ~ मुदित मिश्र विपश्यी
मधुमक्खी की तरह गुणरुपी मिठास एकत्र करते रहें।
'जहां लोग खुद को एक दूसरे से श्रेष्ठ समझते हों वहां एकता कैसे हो सकती है?' सब लोग एक ही धरातल से जुडे हुए हैं, एक ही जमीन पर खडे हैं। यह हर एक को जानना पडता है।' आप अर्थात स्वयं। आपा अर्थात अपना स्वरुप, अपनी सत्ता। आपा अपनी सत्ता का ज्ञान है।' आपे से बाहर निकलने को सब जानते हैं, आपे में रहने के महत्व को बहुत कम लोग जानते हैं। जानते हों तो शांति स्थापित हो जाय और सर्वव्यापी समता के अनुभव मे स्थिति हो जाय।'
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सत्ता एक ही है पर इसे जानने के लिये अपने आपे में रहना पडे।' आपे में रहना, आपे को बिसराना नहीं है। बिसराना तो समाधि या भक्ति में होता है।' साधारणतया क्रोधादि के अतिरेक से मन परकाबू न रहे, उत्तेजना में विवेक खो जाय, धैर्य न रहे तो आपे से बाहर होना कहा जाता है। फिर भी सिर्फ यही नहीं है, और भी कई कारण है जिनसे कहा जा सकता है कि आदमी कभी कभी नहीं अपितु हर वक्त आपे से बाहर ही होता है।'
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व्यक्ति अकेला बैठा है शांत जैसा तब भी नहीं कहा जा सकता कि वह आपे में है। वह विचारों में तो होता ही है और विचारों में रहना आपे से बाहर रहना ही है।' जो अपने आपे में है जिसे अपनी सत्ता का ज्ञान है वह तो स्वस्थ है। उसके सारे क्रियाकलाप स्वस्थता से परिचालित होते हैं। वह विचारों में नहीं खोया होता।' आपे में रहने वाला रागद्वेष से परे होता है। उसके सभी कार्य ठीक निर्णय से प्रेरित होते हैं।'
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कृष्ण ने जिस बुद्धि योग की बात कही है वह आपा संभालना ही है, सजग रहना है।' आदमी शरीर से नहीं तो वाणी से, वाणी से नहीं तो मन से तो हिंसा करता ही है। आदमी को बहुत सारी चीजें नापसंद हों यह स्वाभाविक है पर दूसरा आदमी पसंद न हो यह हिंसा ही है।' प्रेम और पसंद अलग अलग हैं। जो अपने आपे में है उसीमें प्रेम प्रकट होता है।'
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आपा सत्ता का ज्ञान है। ऐसी सत्ता जो सर्वव्यापी है, जिससे सब कुछ अभिन्न है। यही कारण है जो आपे में रहने का अर्थ है सर्वव्यापक आपे में रहना।'
स्वाभिमान को अभिमान से श्रेष्ठ माना जाता है पर क्या स्वाभिमान, आपे में रहना है? नहीं। यदि हो तब भी उसमें तमोगुण की झलक है।' अभिमान परनिर्भर है। अभिमानी व्यक्ति के लिये अपने आपमें रहना असंभव है। वह आक्रामक होता है।'
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अपने आपमें रहने से वस्तुतः आध्यात्मिकता ही प्रकट होती है क्योंकि कि यह आत्मस्थिति का सूचक है।' शरीर में रहना भी आपे से बाहर रहना है फिर भी आदमी शरीर तक ही सीमित रहे तब भी ठीक है वह निकटतम जो है।' सभी लोग अपने अपने शरीरों तक सीमित रहें तो यह आपे में रहने जैसा है यद्यपि है नहीं। मन में बखेडा होता है और जाहिर है वह अपने आपे में रहना नहीं है।'
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अपने आपे में रहने वाला व्यक्ति मौन है, शांत है सुखी है- परनिर्भर होकर नहीं, आत्मनिर्भर सुखी।' हर आदमी मौलिक रुप से आत्मनिर्भर सुखी है सिर्फ वह आपे से बाहर रहना सीख गया है। इसका भी कारण है सुख का स्रोत बाहर नजर आता है जबकि सुख का स्रोत अपने आपे में है। यह सुधबुध है और सत्ता सूचक भी। उस सत्ता में जो मूलतः सर्वव्यापी है।' गीतोक्त अभ्यास और वैराग्य, सुख के आंतरिक स्रोत की पहचान करा देता है। यही पहचान हितकारी है।'

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