गुरुवार, 6 दिसंबर 2018

= समर्थता का अंग ५१(२५/२८) =

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*देख दीवाने ह्वै गए, दादू खरे सयान ।*
*वार पार कोई ना लहै, दादू है हैरान ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*समर्थता का अंग ५१*
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ढोल दमामे१ जंत्र२ साज३, नालि४ चलावहिं आतम बाज६ । 
जड़ चेतन हुं बुलाय चलाये, त्यों आदम५ अल्लाह बनाये ॥२५॥ 
ढोल नगाड़ा१, सितार२ आदि बाजों३ को जीवात्मा बजाता६ है और बन्दूक४ चलाता है, बन्दूक को चलाने पर, जड़ बन्दूक की ध्वनी चेतन मोरादि प्राणियों को बुला देती है यह मानव की कला है, वैसे ही ईश्वर ने मनुष्य५ को बनाया है किन्तु मानव की कला से ईश्वर की कला अद्भुत है । 
विषधर१ में विष रूप है, मुख अमृत मणि नाम । 
रज्जब रचना बलि गया, कौन वस्तु कहिं ठाम ॥२६॥
सर्प१ में विष ही प्रधान है किन्तु मुख में अमृत के समान मणि भी रख दी है, वैसे ही मणि में विषयाशारूप विष की ही अधिकता रहती है किन्तु मुख में अमृत रूप प्रभु नाम भी रहता है । देखो, किस वस्तु को वे प्रभु किस स्थान में रख देते हैं, उन प्रभु की रचना चातुर्य पर हम बलिहारी जाते हैं । 
देखो शोणित१ क्षीर२ ह्वै, क्षीर पलट शोणित्ति३ । 
रज्जब रीझ्या देखकर, नमो नियंता४ मत्ति५ ॥२७॥ 
देखो, रक्त१ से दूध२ बनता है और दूध से रक्त३ बनता है । संसार के व्यवस्थापक४ प्रभु की बुद्धि५ देख कर के हम उनमें अनुरक्त होकर उन्हें नमस्कार करते हैं । 
तृण में कण१ कण में सुतृण, करता कुदरत धन्न । 
रज्जब रचना अगह गति२, कहि को समझे मन्न ॥२८॥ 
धन्य है उस सृष्टिकर्त्ता प्रभु की शक्ति, तृण से अन्न के दाने१ निकलते हैं और दानों से तृण निकलते हैं । उसकी रचना रूप लीला२ इन्द्रियों से अग्राह्य है केवल मन से समझ में आती है, अत: उसे कौन कह सकता है ।
(क्रमशः)

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