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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
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(१२)
*ष्याली तेरै ष्यालका कोई अंत न पावै ।*
*कब का षेल पसारिया कछु कहत न आवै ॥टेक॥*
हे आध्यात्मिक क्रीडक ! आपकी क्रीडा(खेल) का कोई अन्त(सीमा) नहीं है । आपने कब से यह क्रीडा आरम्भ की - यह भी कोई जानता ॥टेक॥
*ज्यौं का त्यौं ही देषिये पूरन संसारा ।*
*सरिता नीर प्रबाह ज्यौं नहिं खंडित धारा ॥१॥*
इसको कोई किधर से भी देखे, इसमें कोई कमी(निर्माण में खोट) नहीं दिखायी देता । कोई महानदी जैसे निरन्तर बहती रहती है, उसकी धारा कभी खण्डित नहीं होती; जैसे ही यह समस्त सृष्टि भी सब ओर से पूर्ण ही दिखायी देती है ॥१॥
*दीप जरत ज्यौं देषिये जैसैं का तैसा ।*
*को जानै केता गया जग पावक ऐसा ॥२॥*
किसी दीपक को रात्रिपर्यन्त देखिये, वह जलता हुआ ही अखण्ड रूप से दिखायी देगा । कौन जाने इसकी अग्नि में कितना(कीट) संसार जल कर भस्म हो गया ॥२॥
*जैसैं चक्र कुलाल का फिरता बहु दीसै ।*
*ठौर छाडि कतहु न गया यह बिसवा बीसै ॥३॥*
जैसे किसी कुम्हार का चक्र चलता हुआ नहीं दीखता है । यह अपना स्थान छोड़कर अन्यत्र नहीं गया - यह भी पूर्ण सत्य है ॥३॥
*प्रगट करै गुप्ता करै घट घूंघट ओटा ।*
*सुन्दर घटत न देषिये यह अचिरज मोटा ॥४॥*
आप(ईश्वर) इस सृष्टि का निर्माण प्रकट रूप से भी करते हैं तथा गुप्त रूप से भी करते हैं; आवरण देकर भी करते हैं, निवारण भी करते हैं । महात्मा सुन्दरदासजी कहते हैं - परन्तु इस निर्माण में कभी किसी ओर से भी न्यूनता(कमी) आती नहीं दिखायी देती । - यही महान् आश्चर्य है ! ॥४॥
(क्रमशः)

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