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॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
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*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
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(१४)
*एक अषंडित देषिये सब स्वयं प्रकाशा ।*
*छता अनछता ह्वै गया यह बडा तमासा ॥टेक॥*
वह प्रधान तत्त्व एक है, अखण्ड है तथा स्वयंप्रकाश है । फिर भले ही वह दृष्ट हो या अदृष्ट । यह बात अद्भुत(तमाशा) ही प्रतीत होती है ॥टेक॥
*पंच तत्त दीसै नहीं नहिं इन्द्री देवा ।*
*मन बुधि चित दीसै नहीं है अलष अभेवा ॥१॥*
वे पाँच तत्त्व प्रत्यक्ष नहीं होते, व सभी इन्द्रियाँ ही प्रत्यक्ष होती हैं । इनमें मन, बुद्धि एवं चित्त-दृष्ट नहीं हैं, क्योंकि ये अलक्ष्य एवं अभेद्य हैं ॥१॥
*सत्त रज तम दीसै नहीं नहिं जाग्रत सुपना ।*
*सुषुपति हौं तुरिया नहीं नहिं और न अपना ॥२॥*
सत्त्व, रज एवं तम का प्रत्यक्ष नहीं होता । न जाग्रत् स्वप्न का ही प्रत्यक्ष होता है । न सुषुप्ति एवं तुरीयातीत अवस्था को अपना कहा जा सकता है, न किसी अन्य को ॥२॥
*काल कर्म दीसै नहीं नहिं आहि सुभावा ।*
*प्रकृति पुरुष दीसै नहीं नहिं आव न जावा ॥३॥*
काल, कर्म एवं स्वभाव का भी प्रत्यक्ष नहीं होता; इसी प्रकार, प्रकृति एवं पुरुष का भी प्रत्यक्ष नहीं होता । न आगति या गति का ही ॥३॥
*ज्ञे ज्ञाता दीसै नहीं नहिं ध्याता ध्यानं ।*
*सुन्दर सोधत सोध तैं सुन्दर ठहरानं ॥४॥*
ज्ञेय एवं ज्ञाता पदार्थ का भी प्रत्यक्ष नहीं होता, न ध्याता एवं ध्यान पदार्थ का ही प्रत्यक्ष होता है । महाराज श्रीसुन्दरदासजी कहते हैं - विचारक जिज्ञासु यहीं विचार करता हुआ ठहर जाता है ॥४॥
(क्रमशः)

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