#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*पंच तत्त्व तैं घट भया, बहु विधि सब विस्तार ।*
*दादू घट तैं ऊपजै, मैं तैं वर्ण विकार ॥*
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
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*मूलारंभ का अंग ५२*
इस अंग में मूल कारण से ही संसार रूप कार्य उत्पन्न होता है, यह विचार कर रहे हैं ~
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ज्यों जल बीरज१ जलचरहुं, अवनि अठारह भार ।
पीछैं बीरज२ बीज तैं, यहु मत मूल विचार ॥१॥
जैसे प्रथम तो जलचरों का कारण१ जल ही है, पीछे माता-पिता के रज वीर्य२ से उत्पन्न होते रहते हैं । अठाहर भार वनस्पतियों का प्रथम कारण पृथ्वी ही है पीछे अपने - अपने बीज से उत्पन्न होती रहती है, यही मूल कारण के सिद्धांत का विचार है, उक्त प्रकार ही प्रथम सब सृष्टि - कर्त्ता प्रभु से ही होती है पीछे विभिन्न कारणों की कल्पना होती है ।
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ज्यों ओले१ सब अंभ२ तैं, त्यों पाणी करि पिंड ।
रज्जब उपजे आप४ सौं, अजों सु तिन३ के अंड ॥२॥
जैसे जल२ से बर्फ के कंकर१ होते हैं वैसे ही वीर्य रूप जल४ से शरीर अपने आप ही उत्पन्न हो जातें है, अभी भी उन३ शरीरों के कारण पक्षीयों के अंडों में देख सकते हो पहले जल ही रहता है, पीछे शरीर बनता है ।
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जन रज्जब आत्मा अवलि१, यहु वित२ अविगत३ दीन ।
और तत्त्व तत्त्वों भये, करनहार यूं कीन ॥३॥
प्रथम१ यह आत्मा रूप धन२ तो परमात्मा३ ने दिया है, पीछे अन्य बुद्धि आदि तत्त्व आकाशादि पाँचों तत्त्वों से उत्पन्न हुये हैं और पंच तत्त्व माया से हुये हैं, इस प्रकार उस सृष्टिकर्त्ता प्रभु ने संसार की रचना की है ।
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ओंकार सौं आतमा, पंच तत्त्व कर पिंड ।
यहु भ्रामक भागा सु यूं, इहि विधि सब ब्रह्मंड ॥४॥
ओंकार से आत्मा और आत्मा से आकाशादि पंच तत्त्व उत्पन्न होते हैं पीछे पंच तत्त्वों से स्थूल शरीर होते हैं, इस प्रकार सब ब्रह्माण्ड होता है, यह भ्रम में डालने वाला सिद्धान्त हमारे मन से भाग गया है, सृष्टि तो उक्त तीन की साखी के अनुसार ही होती है ।
(क्रमशः)

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