सोमवार, 3 दिसंबर 2018

= समर्थता का अंग ५१(१३/१६) =

#daduji

卐 सत्यराम सा 卐
*दादू गुप्त गुण परगट करै, परगट गुप्त समाइ ।*
*पलक मांहि भानै घड़ै, ताकी लखी न जाइ ॥* 
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**श्री रज्जबवाणी**
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
साभार विद्युत् संस्करण ~ Tapasvi Ram Gopal
*समर्थता का अंग ५१*
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पिंड सरोवर प्राण जल, सांई सूर शरीर । 
रज्जब काढै कैद किरण, बिच वित्त१ राखे वीर२ ॥१३॥ 
जैसे सरोवर में कैद हुये जल को सूर्य अपनी किरणों द्वारा निकाल लेता है और सरोवर में पड़े हुये अन्य धन१ को नहीं निकालता, वैसे ही हे भाई२ ! शरीर में कैद हुये प्राणों को ईश्वर अपनी शक्ति से निकाल लेते हैं किन्तु शरीर की अन्य धातुओं को नहीं निकालते, यह उसकी शक्ति की अद्भुतता है । 
निराकार न्यारा रखै, निज अंग१ माँहिं न मेलै । 
अगम अगाध अविगत आपै, अकल अगोचर खेलै ॥१४॥ 
निराकार प्रभु अपने स्वरूप१ को माया से अलग ही रखते हैं, माया में नहीं मिलने देते । अगम, अगाधन, मन इन्द्रियों के अविषय, कला विभाग से रहित, प्रभु इन्द्रियों की गति से आगे रहकर के ही विश्व में क्रीड़ा करते हैं । 
काया कृमि काष्ट में घुण, जल ही जलचर जोय१ । 
करता किये सु कौन विधि, सो समझै नहीं कोय ॥१५॥ 
देख१, शरीर में कृमि, काष्ट में घुण और जल में जलाचर, उस सृष्टिकर्ता प्रभु ने किस प्रकार रचे हैं उस प्रकार को कोई भी नहीं समझता, अत: उसकी शक्ति विलक्षण है । 
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जड़ तत्त्वों में जीव जड़, तन मन साज्या३ श्वास । 
यहु विद्या बाबा१ कनें२, आवे न आतम पास ॥१६॥ 
जड़ तत्त्वों में जीव तथा जड़ तन मन और श्वासों को कैसे अद्भुत ढंग से सजाया३ है, यह विद्या उन प्रभु१ के पास२ ही है, जीवात्मा के हाथ नहीं लगती ।
(क्रमशः)

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