#daduji
卐 सत्यराम सा 卐
*श्री दादू अनुभव वाणी* टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥
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*पारिख का अँग २७*
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पारिख अपारिख
काचा उछलै ऊफणै, काया हांडी माँहिं ।
दादू पाका मिल रहे, जीव ब्रह्म द्वै नाँहिं ॥१९॥
१९ - २२ में परीक्षक अपरीक्षक का परिचय दे रहे हैं, जैसे अग्नि पर चढ़ी हंडिया में अन्न का दाना जब तक कच्चा रहता है तब तक उछलता - उफनता है, पक जाने पर जल के साथ मिल कर रहता है । वैसे ही जीव को जब तक ब्रह्मज्ञान नहीं होता तब तक ही शरीर में आता जाता है, ब्रह्मज्ञान होते ही जीव ब्रह्म में अभेद होकर रहता है । उस अवस्था में जीव और ब्रह्म दो प्रमाणित नहीं होते ।
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दादू बांधे सुर नवाये१ बाजैं, एव्हा२ शोध रु लीज्यो ।
राम - सनेही साधू हाथैं, बेगा मोकल३ दीज्यो ॥२०॥
प्रसंग - महाराज ने गुजरात से मँजीरे मंगवाने के लिए यह २० वीं साखी लिख भेजी थी । जैसे बंधे स्वर, विलक्षण तेज१ ध्वनि से बजने वाले हों, ऐसे२ खोज कर लेना और राम के प्यारे किसी सँत के हाथ शीघ्र ही भेज३ देना । अध्यात्म अर्थ - जिसने इन्द्रिय रूप सुरों को सँयम में बांध रक्खे हो और अपने अहँकार - शिर को नीचे१ करके भजन रूप ध्वनि करने वाला हो, ऐसे२ जिज्ञासु को खोज करके उसी राम के प्यारे जिज्ञासु के अन्त:करण हाथ में शीघ्र अपना ज्ञान धन दे दो३ वो ऐसे सिद्ध सँत के हाथ में अपने उद्धार के लिए अपने को समर्पण कर दो३ ।
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प्राण जौहरी पारिखू१, मन खोटा ले आये ।
खोटा मन के माथा मारे, दादू दूर उड़ावे२॥२१॥
प्राण रूप रत्न की परीक्षा१ करने वाले सँत - जौहरी के पास यदि कोई प्राणी दोषों से परिपूर्ण बुरे मन को लेकर आता है तो बुरे मन वाले के अहँकार रूप शिर पर भक्ति - विचारादि दँडे मार कर, उसके दोषों को दूर हटा२ देता है और अपरीक्षक हो तो नहीं हटा सकता ।
(क्रमशः)

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