॥ श्री दादूदयालवे नमः ॥
स्वामी सुन्दरदासजी महाराज कृत - *सुन्दर पदावली*
साभार ~ महंत बजरंगदास शास्त्री जी,
पूर्व प्राचार्य ~ श्री दादू आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(जयपुर) व राजकीय आचार्य संस्कृत महाविद्यालय(चिराणा, झुंझुनूं, राजस्थान)
.
*= १२. राग बिलावल(काया बेली ग्रन्थ) =*
.
(१३)
*एकै ब्रह्म बिलास है सूक्षम अस्थूला ।*
*ज्यौं अंकुर तैं बृक्ष है साषा फर फूला ॥टेक॥*
यह समस्त स्थूल एवं सूक्ष्म संसार एकमात्र उस ईश्वर की केवल क्रीडा(खेल) है; जैसे कि लोक में एक अंकुर से शाखा फल फूल सहित इतना बड़ा विशाल वृक्ष दिखायी देता है ॥टेक॥
*जैसैं भाजन मृतिका, अंतर नहिं कोई ।*
*पांनी तैं पाला भया, पुनि पांनी सोई ॥१॥*
जैसे घट आदि सभी पात्र एक ही मृत्तिका से बने होते हैं, वहाँ मृत्तिका में कोई भेद नहीं होता । या पाला(बर्फ) पिघलने पर पुनः जल हो जाती है ॥१॥
*जैसैं दीपक तेज तैं, ऐसा यहु षेला ।*
*घाट घरे बहु भांति के, है कनक अकेला ॥२॥*
जैसे छोटे दीपक का प्रकाश उस बृहत्तम तेज का ही अंश है । उसी प्रकार इस संसार की वस्तुओं के विषय में भी समझिए ॥२॥
*बायु वघूरा कहन कौं ऐसा कछु जांना ।*
*बादर दीसत गगन मैं तेउ गगन बिलांना ॥३॥*
जैसे एक ही सुवर्ण धातु से विविध अलंकारों का निर्माण होता है । उसी प्रकार, साधारणतः एक ही वायु धातु व्यवहार में प्राण वायु या आन्धी आदि भेद से अनेक प्रकार की होती है । या आकाश में मेघ दिखायी देने पर 'आकाश ढँक गया' - ऐसा लोक व्यवहार होता है ।
*सतगुरु तैं संसा गया, दूजा भ्रम भागा ।*
*सुन्दर पटहि बिचार तैं, सब देषे धागा ॥४॥*
इस विधि से, लोक में नाना प्रकार के भ्रमभेद दिखायी देते हैं । परन्तु सद्गुरु के मिलने पर जिज्ञासु के ये सभी द्वैत भ्रम नष्ट हो जाते हैं । महाराज श्री सुन्दरदास जी कहते हैं - जैसे पट के विषय में सूक्ष्म विचार करने पर वहाँ कोई पट(वस्त्र) नामक कोई वस्तु नहीं मिलती । वहाँ तो सब धागा(तन्तु = सूत्र) ही दिखायी देते हैं ॥४॥
(क्रमशः)

कोई टिप्पणी नहीं:
एक टिप्पणी भेजें