रविवार, 9 दिसंबर 2018

= पारिख का अँग(२७ - ३१/३३) =


॥ दादूराम सत्यराम ॥ 
*श्री दादू अनुभव वाणी* 
टीका ~ संतकवि कविरत्न स्वामी नारायणदास जी महाराज, पुष्कर, राजस्थान ॥ 
*पारिख का अँग २७* 
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कर्त्ता कसौटी 
जे निधि कहीं न पाइये, सो निधि घर - घर आहि । 
दादू महंगे मोल बिन, कोई न लेवे ताहि ॥३१॥
३१ - ३८ में ईश्वर सम्बन्धी परीक्षा का परिचय दे रहे हैं, जो परब्रह्म रूप निधि बाहर खोजने पर कहीं भी नहीं मिलती, वह प्रत्येक प्राणी के अंत:करण में साक्षी रूप से स्थित है किन्तु साधन रूप महामूल्य चुकाये बिना उसे कोई भी प्राप्त नहीं कर सकता । प्रसंगार्थ, जो ज्ञान - निधि सँतों के बिना कहीं भी नहीं मिलती, वह सँतों द्वारा घर - घर आ रही है, किन्तु श्रद्धारूप महामूल्य बिना उसे कोई भी नहीं ले सकता । 
प्रसंग ~ अकबर बादशाह से मिल कर सीकरी से आते समय दादूजी महाराज अपने शिष्यों के साथ दौसा ग्राम पहुंचे, तब वहां किसी ने भी उनकी आवभगत नहीं की । तब महाराज ने शिष्यों को यह ३१ वीं साखी कही थी । प्रसंग कथा दृ - सु - सि - त - ७ - १३४ में देखो। 
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खरी कसौटी कीजिये, बानी१ बधती जाइ ।
दादू साचा परखिये, महंगे मोल बिकाइ ॥३२॥ 
जैसे सच्चे रत्न की परीक्षा कसौटी पर की जाती है तब वह महामूल्य में बिकता है, वैसे ही सँतों के वचनों की सच्ची परीक्षा जीवन में अनुभूति द्वारा करनी चाहिए । सच्चे सिद्ध होने पर ये वचन अनमोल ज्ञात होंगे और इनकी महिमा रूप१ काँति बढ़ती ही जायेगी । 
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राम कसे१ सेवक खरा, कदे न मोड़े अँग । 
दादू जब लग राम है, तब लग सेवक संग ॥३३॥ 
राम के द्वारा परीक्षा१ करने पर जो सेवक सच्चा सिद्ध होता है वह कभी भी राम से अपने तन मनादि नहीं मोड़ता, जब तक राम है तब तक वह सेवक अभेद रूप से राम के साथ रहता है । 
(क्रमशः)

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